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Praveen Sharma SHAJAR
husn ko be-naqaab dekha hai
husn ko be-naqaab dekha hai | हुस्न को बे-नक़ाब देखा है
- Praveen Sharma SHAJAR
हुस्न
को
बे-नक़ाब
देखा
है
इश्क़
तो
बे-हिसाब
होना
था
तेरी
नज़रों
का
दोष
कोई
नहीं
हम
को
यूँँ
भी
ख़राब
होना
था
- Praveen Sharma SHAJAR
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दिल
की
आब-ओ-हवा
उदासी
है
धड़कनों
की
सदा
उदासी
है
हो
के
नाकाम
चारा-गर
बोला
आशिक़ी
में
दवा
उदासी
है
बाद
आए
शराब
भी
इसके
यूँँ
कि
पहला
नशा
उदासी
है
ज़िंदगी
में
उदासी
है
कितनी
ज़िंदगी
है
भी
या
उदासी
है
मैंने
देखा
है
बारहा
हँस
कर
यार
हर
मर्तबा
उदासी
है
कौन
सा
जुर्म
हो
गया
हम
से
जाने
किस
की
सज़ा
उदासी
है
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Praveen Sharma SHAJAR
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बदन
बदन
सफ़र
किया
मुहब्बतों
की
आस
में
घुटन
घुटन
बसर
किया
मुहब्बतों
की
आस
में
मुझे
ख़बर
नहीं
कि
इश्क़
रूह
का
है
क्या
बला
बदन
लहू
से
तर
किया
मुहब्बतों
की
आस
में
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Praveen Sharma SHAJAR
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मैं
जैसे
कर्ण
हूँ
और
तू
मेरे
कुंडल
कवच
जैसी
तुझे
ख़ुद
से
जुदा
करने
में
क्या
बीती
है
मुझ
सेे
पूछ
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अपना
हाथ
रहा
तो
है
इस
दुनिया
की
बर्बादी
में
हमने
भी
तो
शे'र
लिखे
थे
चाहत
और
मुहब्बत
के
Praveen Sharma SHAJAR
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तेरे
ख़िलाफ़
अगर
जंग
में
उतारा
गया
तो
साफ़-साफ़
समझ
ले
कि
मैं
तो
मारा
गया
वो
जब
गया
था
तो
कुछ
भी
नहीं
गया
था
मेरा
जब
उसकी
याद
गई
है
तो
हर
सहारा
गया
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