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Navneet krishna
ik silsila taveel raha intezar ka
ik silsila taveel raha intezar ka | इक सिलसिला तवील रहा इंतिज़ार का
- Navneet krishna
इक
सिलसिला
तवील
रहा
इंतिज़ार
का
अब
हाल
क्या
सुनाएँ
दिल-ए-
बेक़रार
का
- Navneet krishna
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किसी
पे
करना
नहीं
ए'तिबार
मेरी
तरह
लुटा
के
बैठोगे
सब्र-ओ-क़रार
मेरी
तरह
Fareed Parbati
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उस
गली
ने
ये
सुन
के
सब्र
किया
जाने
वाले
यहाँ
के
थे
ही
नहीं
Jaun Elia
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वो
मुझ
को
छोड़
के
जिस
आदमी
के
पास
गया
बराबरी
का
भी
होता
तो
सब्र
आ
जाता
Parveen Shakir
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भूख
है
तो
सब्र
कर,
रोटी
नहीं
तो
क्या
हुआ
आजकल
दिल्ली
में
है
ज़ेर-ए-बहस
ये
मुद्दआ
Dushyant Kumar
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सब्र
मेरा
फ़िक्र
में
है
रोज़-ओ-शब
ये
सोचता
है
दूध
में
दोनों
अँगूठी
ढूँढते
कैसे
लगेंगे
Raj
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शाख़-ए-उम्मीद
से
कड़वा
भी
उतर
सकता
हूँ
रोज़
ये
बात
मुझे
सब्र
का
फल
कहता
है
Rakib Mukhtar
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वहशत
के
कारखाने
से
ताज़ा
ग़ज़ल
निकाल
ऐ
सब्र
के
दरख़्त
मेरा
मीठा
फल
निकाल
Ammar Iqbal
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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मेरे
होंठों
के
सब्र
से
पूछो
उसके
हाथों
से
गाल
तक
का
सफ़र
Mehshar Afridi
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बे
तेरे
क्या
वहशत
हम
को
तुझ
बिन
कैसा
सब्र-ओ-सुकूँ
तू
ही
अपना
शहर
है
जानी
तू
ही
अपना
सहरा
है
Ibn E Insha
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इश्क़
में
है
आने
वाला
और
क्या
रोज़
धोखा
खाने
वाला
और
क्या
किसका
चेहरा
था
हमारे
ख़्वाब
में
होगा
कोई
आने
वाला
और
क्या
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Navneet krishna
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इंसाँ
के
ज़मीरों
को
जला
देती
है
ग़ुर्बत
कुछ
बात
है
दर
उसका
अँधेरे
में
खुला
है
Navneet krishna
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ज़मी
पे
अगरचे
जवाँ
और
भी
हैं
हमारी
तरह
के
कहाँ
और
भी
हैं
तुम्हारी
नज़र
के
अलावा
भी
हमदम
ज़माने
में
तीर-ओ-कमाँ
और
भी
हैं
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Navneet krishna
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इश्क़
में
धोखा
खाने
वाले
हम
है
दर्द
छुपाने
वाले
छोड़
के
मुझको
जाने
वाले
लौट
के
कब
हैं
आने
वाले
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Navneet krishna
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घुट-घुट
के
जिए
मर
न
सके
हाए
रे
क़िस्मत
इस
दौर
में
जीना
भी
मेरी
जान
कला
है
Navneet krishna
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