mohabbat ke siva gham aur bhi hain is zamaane men | मोहब्बत के सिवा ग़म और भी हैं इस ज़माने में

  - Vikas Shah musafir
मोहब्बतकेसिवाग़मऔरभीहैंइसज़मानेमें
येसबकुछछोड़करमसरूफ़हूँपैसाकमानेमें
हमेंमालूमहैसबकुछयहाँपैसाहीहोताहै
बड़ाख़र्चाहैआताअबमु'आलिजकोदिखानेमें
अमीरोंसेमुझेनफ़रतनहींबसयेशिकायतहै
येरोटीफेंककरख़ुशहैंगरीबोंकोसतानेमें
मेरीआँखोंकेआँसूइसतरहसूखेहुएहैंअब
बड़ाग़ुस्साहैआताअबज़बरदस्तीबहानेमें
मुझेअबयादआतेहैंवोबचपनकेपुरानेदिन
मुझेहरचीज़मिलजातीथीबसरोकरदिखानेमें
  - Vikas Shah musafir
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