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Najib Murad
sabr karna jahaan pe tha mushkil
sabr karna jahaan pe tha mushkil | सब्र करना जहाॅं पे था मुश्किल
- Najib Murad
सब्र
करना
जहाॅं
पे
था
मुश्किल
शुक्र
शब्बीर
ने
किया
उस
पर
- Najib Murad
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समझ
आ
गई
है
वो
बिछड़ा
है
जब
से
मुझे
उस
के
ग़म
ने
बड़ा
कर
दिया
है
Najib Murad
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कर
लिया
उसने
भी
किनारा
है
जिसके
क़ब्ज़े
में
दिल
हमारा
है
वो
मेरी
आँख
से
उतरता
नहीं
मुझ
में
इक
दर्द
जो
तुम्हारा
है
कैसे
कह
दें
कि
वो
पराया
है
नाम
से
उसके
ही
गुज़ारा
है
अब
तो
बस
मौत
आना
बाक़ी
है
कर
दिया
उसने
भी
इशारा
है
डूबने
वालों
को
बचाता
नहीं
कितना
मजबूर
ये
किनारा
है
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Najib Murad
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कोई
उन
सेे
कहो
अब
लौट
आएँ
बिना
उनके
दिवाली
कैसे
होगी
Najib Murad
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एक
मुद्दत
से
तू
लापता
है
ढूॅंढने
से
भी
तू
कब
मिला
है
हर
घड़ी
याद
में
तू
है
शामिल
मेरी
धड़कन
से
तू
कब
जुदा
है
बस
ये
बातें
सताती
हैं
मुझको
क्यूँँ
तू
पहला
नहीं
दूसरा
है
ख़ुश
मैं
इस
बात
पे
हो
गया
हूँ
तेरा
मेरा
तो
एक
रास्ता
है
मेरी
नादानी
पर
हॅंस
रहे
हो
तुम
तो
कहते
थे
तू
आईना
है
मेरी
अब
जा
के
क़ीमत
बढ़ी
है
जब
से
तूने
मुझे
पढ़
लिया
है
ज़हर
कैसे
उसे
हम
पिलाऍं
जिसके
हाथों
से
पानी
पिया
है
अपनी
ज़ुल्फ़ों
का
आदी
बना
के
पूछते
हो
मुझे
क्या
हुआ
है
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Najib Murad
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थक
कर
वो
नौकरी
से
कहने
लगा
है
लड़का
मेरे
लिए
तो
बस
तुम
इतवार
ले
के
आना
Najib Murad
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