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Mohsin Ahmad Khan
chaand ko dekhna teri aadat
chaand ko dekhna teri aadat | चाँद को देखना तेरी आदत
- Mohsin Ahmad Khan
चाँद
को
देखना
तेरी
आदत
सो
तुझे
देखना
मेरी
आदत
- Mohsin Ahmad Khan
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ये
आँसू
ढूँडता
है
तेरा
दामन
मुसाफ़िर
अपनी
मंज़िल
जानता
है
Asad Bhopali
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हर
किसी
से
ही
मुहब्बत
माँगता
है
दिल
तो
अब
सब
सेे
अक़ीदत
माँगता
है
सीख
आया
है
सलीक़ा
ग़ुफ़्तगू
का
मुझ
सेे
मेरा
दोस्त
इज़्ज़त
माँगता
है
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उम्र
से
मेरी
फ़नकारी
को
मत
आँको
उस्तादों
से
बेहतर
ग़ज़लें
कहता
हूँ
Harsh saxena
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किनारे
दो
मिलाने
में
हैं
कितनी
मुश्किलें
सोचो
ये
पुल
दिन
भर
ही
सीने
पे
बिचारा
चोट
खाता
है
Prashant Beybaar
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गिफ़्ट
कर
देता
हूँ
उसको
मैं
किताबें,
लेकिन
उनको
पढ़
लेने
की
मोहलत
नहीं
देता
उसको
Harman Dinesh
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झिझकता
हूँ
उसे
इल्ज़ाम
देते
कोई
उम्मीद
अब
भी
रोकती
है
Shariq Kaifi
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कल
चौदहवीं
की
रात
थी
शब
भर
रहा
चर्चा
तिरा
कुछ
ने
कहा
ये
चाँद
है
कुछ
ने
कहा
चेहरा
तिरा
Ibn E Insha
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मुमकिना
फ़ैसलों
में
एक
हिज्र
का
फ़ैसला
भी
था
हमने
तो
एक
बात
की
उसने
कमाल
कर
दिया
Parveen Shakir
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रास्ता
भूल
के
आ
निकले
हैं
हम
तेरे
लोग
नहीं
थे
दुनिया
Ashraf Yousafi
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मशवरा
हम
भी
तो
दे
सकते
थे
पर
तेरा
साथ
दे
रहे
थे
हम
Vishal Singh Tabish
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ज़िंदगी
तो
ज़िंदगी
है
हाँ
यही
कुछ
चंद
की
है
गर
गुज़ारें
सौ
बरस
भी
आख़िरश
फिर
मौत
ही
है
है
ख़ुदा
गर
काफ़ी
फिर
क्यूँँ
दुनिया
की
यूँँ
तिश्नगी
है
आख़िरत
का
इल्म
है
पर
बात
सुन
कर
अनसुनी
है
है
क़यामत
सर
पे
मोहसिन
हर
तरफ़
आवारगी
है
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Mohsin Ahmad Khan
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मेरी
आँखों
को
ग़िज़ा
दो
अपना
चेहरा
तुम
दिखा
दो
कब
तलक
इतनी
ख़मोशी
जो
भी
दिल
में
है
बता
दो
जानते
हैं
हम
ग़लत
थे
जो
हुआ
वो
सब
भुला
दो
हम
अगर
अब
भी
बुरे
हैं
तो
हमें
फिर
तुम
सज़ा
दो
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Mohsin Ahmad Khan
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में
जिसे
चाहता
हूँ
कई
साल
से
इक
वही
शख़्स
मुझ
को
नहीं
जानता
Mohsin Ahmad Khan
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जान
हो
तो
ये
भी
जान
लो
तुम
मेरी
कुछ
नहीं,
मान
लो
Mohsin Ahmad Khan
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तुम
ने
उस
के
हाथों
में
फूलों
को
देखा
और
मैंने
फूलों
के
हाथों
में
उस
को
Mohsin Ahmad Khan
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