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Mohit Subran
kabhi koi saa
kabhi koi saa | कभी कोई साथी ज़ख़्म देता कभी मैं ख़ुद को ही नोच लेता
- Mohit Subran
कभी
कोई
साथी
ज़ख़्म
देता
कभी
मैं
ख़ुद
को
ही
नोच
लेता
है
ज़ख़्म
खाने
में
लुत्फ़
कितना
ये
लुत्फ़
केवल
मुझे
पता
है
- Mohit Subran
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मुझे
मालूम
है
माँ
की
दुआएँ
साथ
चलती
हैं
सफ़र
की
मुश्किलों
को
हाथ
मलते
मैंने
देखा
है
Aalok Shrivastav
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चलो
न
फिर
से
दरिया
के
नज़दीक
चलें
चलो
न
फिर
से
डुबकी
साथ
लगाएँगे
Atul K Rai
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दूर
रहें
तो
याद
बहुत
आती
सब
की
साथ
रहें
तो
घर
में
झगड़े
होते
हैं
Tanoj Dadhich
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सवाल
है
घड़ी
ईजाद
करने
वाले
से
मिलायी
पहली
घड़ी
उसने
किस
घड़ी
के
साथ
Raj
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हम
ऐसे
लोग
भी
जाने
कहाँ
से
आते
हैं
ख़ुशी
में
रोते
हैं
जो
ग़म
में
मुस्कुराते
हैं
हमारा
साथ
भला
कब
तलक
निभाते
आप
कभी
कभी
तो
हमीं
ख़ुद
से
ऊब
जाते
हैं
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Mohit Dixit
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शर्तें
लगाई
जाती
नहीं
दोस्ती
के
साथ
कीजे
मुझे
क़ुबूल
मिरी
हर
कमी
के
साथ
Waseem Barelvi
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जाने
अब
वो
किसके
साथ
निकलता
होगा
रातों
को
जाने
कौन
लगाता
होगा
दो
घंटे
तैयारी
में
Danish Naqvi
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जानता
हूँ
कि
तुझे
साथ
तो
रखते
हैं
कई
पूछना
था
कि
तेरा
ध्यान
भी
रखता
है
कोई?
Umair Najmi
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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मैं
जंगलों
की
तरफ़
चल
पड़ा
हूँ
छोड़
के
घर
ये
क्या
कि
घर
की
उदासी
भी
साथ
हो
गई
है
Tehzeeb Hafi
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बात
जब
हक़
की
हो
इक
शख़्स
नहीं
आता
है
बात
मज़हब
की
हो
तो
भीड़
निकल
आती
है
Mohit Subran
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ज़ेहन
ज़ख़्मी
है
बद-ख़यालों
से
बात
गर
नफ़सियाती
की
जाती
Mohit Subran
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सँभल
सका
न
जिसे
खा
के
मैं
कभी
भी
फिर
वो
ज़ोर
से
लगी
ठोकर
अभी
भी
पाँव
में
है
Mohit Subran
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अँधेरा
हो
उजाला
हो
वो
चेहरा
याद
आता
है
कभी
मौसम
निराला
हो
वो
चेहरा
याद
आता
है
किसी
लड़की
ने
बेहद
ही
सलीक़े
से
गले
में
जो
दुपट्टा
यार
डाला
हो
वो
चेहरा
याद
आता
है
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Mohit Subran
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शे'र
कहना
है
वो
फ़न
जो
जान-ए-मन
आसाँ
नहीं
'जौन'
ने
जब
ख़ून
थूका
तब
कहीं
ग़ज़लें
हुईं
Mohit Subran
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