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Ammar 'yasir'
uski aankhoñ men pighal jaate hain
uski aankhoñ men pighal jaate hain | उसकी आँखों में पिघल जाते हैं
- Ammar 'yasir'
उसकी
आँखों
में
पिघल
जाते
हैं
हर
शब
आवारा
निकल
जाते
हैं
औरों
की
बातों
का
क्या
ही
करना
उसकी
उन
बातों
से
जल
जाते
हैं
ये
तुम्हें
देख
के
मालूम
हुआ
कैसे
लोग
इतना
बदल
जाते
हैं
- Ammar 'yasir'
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तेरी
आँखों
में
मैं
खोना
चाहता
हूँ
मैं
तेरा
ही
अब
से
होना
चाहता
हूँ
तू
मुझे
अब
पास
तो
अपने
बुला
ले
मैं
तेरी
बाँहों
में
सोना
चाहता
हूँ
मैं
हँसा
इतना
जो
सबके
सामने
सो
अब
अकेले
थोड़ा
रोना
चाहता
हूँ
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अब
नहीं
है
याद
उसको
नाम
हमारा
करता
था
दिल
से
जो
एहतिराम
हमारा
चाहे
हमें
याद
कोई
रक्खे
न
लेकिन
ज़िन्दा
रहेगा
हमेशा
काम
हमारा
ऐसा
नहीं
उसकी
सोच
हम
से
अलग
है
फ़र्क
है
कुछ
जीने
में
मुक़ाम
हमारा
और
भी
अब
मुनहसिर
नहीं
रहा
लेकिन
चाहिए
'यासिर'
हमें
कलाम
हमारा
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माँ
तुझ
को
बताता
तो
नहीं
हूँ
पर
तुझ
को
पता
है
ना
मेरा
प्यार
Ammar 'yasir'
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तुम
जो
थे
उसके
वो
मोहरे
रहना
उसके
कहने
पर
तुम
चलते
रहना
उसने
थामा
औरों
के
हाथों
को
तुम
अपने
हाथों
को
मलते
रहना
सब
दुनिया
को
पाने
को
चल
निकले
तुम
इस
कमरे
में
ही
जलते
रहना
उसको
पाना
और
मसअला
है
लेकिन
ये
बस
में
है
उसको
तकते
रहना
यासिर
मेरी
एक
ही
ख़्वाहिश
है
अब
बस
उसकी
बाहों
में
सोते
रहना
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उस
की
गिनती
गुलाब
में
आती
है
वो
जब
मिलने
हिजाब
में
आती
है
वो
है
जन्नत
में
रहनी
वाली
लड़की
वो
कब
आख़िर
तुराब
में
आती
है
उन
आँखों
का
नशा
मैं
क्या
बतलाऊँ
वो
इक
महँगी
शराब
में
आती
है
उस
की
तुम
को
मिसाल
दूँ
कैसे
मैं
वो
सब
से
ला-जवाब
में
आती
है
हम
'यासिर'
रात
को
सजा
करते
हैं
वो
हम
से
मिलने
ख़्वाब
में
आती
है
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