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Mohammad Akram
surkh aankhoñ se use juda hote dekha hai
surkh aankhoñ se use juda hote dekha hai | सुर्ख़ आँखों से उसे जुदा होते देखा है
- Mohammad Akram
सुर्ख़
आँखों
से
उसे
जुदा
होते
देखा
है
मैंने
उस
फ़ौजी
को
विदा
होते
देखा
है
- Mohammad Akram
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वो
जो
शब
राहों
से
गुज़रते
हैं
लोग
उन्हें
देख
आहें
भरते
हैं
कैसा
मंज़र
है
उनकी
आँखों
का
हम
उन्हीं
में
सदा
ठहरते
हैं
वो
उसी
शा'इरी
का
मिसरा
है
जिसके
ख़ुत्बे
से
हम
निखरते
हैं
उनकी
बातों
में
इक
फ़ज़ीलत
है
उनके
क़ाइल
कभी
न
मरते
हैं
है
कोई
नूर
उनके
चेहरे
में
दूर
जाने
से
सब
मुकरते
हैं
उनकी
नज़रों
में
कोई
जादू
है
मेरे
लम्हें
न
यूँँ
बिसरते
हैं
हैं
वो
ख़ुशबू
किसी
गुलिस्ताँ
की
फूल
सजदे
में
आ
उतरते
हैं
वो
हैं
इक
ख़्वाब
इक
तसव्वुर
हैं
उनकी
ख़ातिर
मलक
सँवरते
हैं
वो
है
फ़िरदौस
मेरे
आलम
की
चाँद
तारे
वहाँ
उभरते
हैं
उनका
एहसास
आसमानी
है
वो
ज़मीं
पे
क़दम
न
धरते
हैं
है
उन्हीं
का
रुसूख़
ऐ
अकरम
इश्क़
हम
बेवजह
न
करते
हैं
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Mohammad Akram
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तेरी
उल्फ़त
में
वतन
शाद
रहेंगे
तेरी
आब-ओ-हवा
में
याद
रहेंगे
मर
के
भी
होंगे
फ़ना
तेरी
अना
पर
तेरी
चाहत
में
यूँँ
आज़ाद
रहेंगे
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Mohammad Akram
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हर
सम्त
रब
के
जलवों
की
ऐसे
शुआएँ
पाता
हूँ
मैं
रोज़
अपनी
माँ
के
क़दमों
में
दुआएँ
पाता
हूँ
Mohammad Akram
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फ़रमाँ-बरदारी
का
आलम
तो
देखिए
ये
दिल
आज
भी
उनके
लिए
धड़कता
है
Mohammad Akram
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गरीब
के
घर
आज
वही
मेहमान
आए
हैं
चुनावी
है
माहौल
सियासत-दान
आए
हैं
Mohammad Akram
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