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Mohammad Akram
ghareeb ke ghar aaj vahii mehmaan aa.e hain
ghareeb ke ghar aaj vahii mehmaan aa.e hain | गरीब के घर आज वही मेहमान आए हैं
- Mohammad Akram
गरीब
के
घर
आज
वही
मेहमान
आए
हैं
चुनावी
है
माहौल
सियासत-दान
आए
हैं
- Mohammad Akram
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मोहब्बत
के
सफ़र
में
हम-क़दम
होना
ज़रूरी
है
अगर
हो
इम्तिहाँ
तो
हम-सफ़र
होना
ज़रूरी
है
ज़रूरी
है
समझना
हम-नवा
के
आरज़ू
को
भी
अगर
जो
इश्क़
है
बाहम-दिगर
होना
ज़रूरी
है
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Mohammad Akram
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तेरी
उल्फ़त
में
वतन
शाद
रहेंगे
तेरी
आब-ओ-हवा
में
याद
रहेंगे
मर
के
भी
होंगे
फ़ना
तेरी
अना
पर
तेरी
चाहत
में
यूँँ
आज़ाद
रहेंगे
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Mohammad Akram
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बड़ा
ग़ुरूर
करते
हैं
वो
अपनी
बेवफ़ाई
में
गुज़ारते
थे
हम
हयात
जिनकी
रत-जगाई
में
Mohammad Akram
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सुर्ख़
आँखों
से
उसे
जुदा
होते
देखा
है
मैंने
उस
फ़ौजी
को
विदा
होते
देखा
है
Mohammad Akram
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वो
जो
शब
राहों
से
गुज़रते
हैं
लोग
उन्हें
देख
आहें
भरते
हैं
कैसा
मंज़र
है
उनकी
आँखों
का
हम
उन्हीं
में
सदा
ठहरते
हैं
वो
उसी
शा'इरी
का
मिसरा
है
जिसके
ख़ुत्बे
से
हम
निखरते
हैं
उनकी
बातों
में
इक
फ़ज़ीलत
है
उनके
क़ाइल
कभी
न
मरते
हैं
है
कोई
नूर
उनके
चेहरे
में
दूर
जाने
से
सब
मुकरते
हैं
उनकी
नज़रों
में
कोई
जादू
है
मेरे
लम्हें
न
यूँँ
बिसरते
हैं
हैं
वो
ख़ुशबू
किसी
गुलिस्ताँ
की
फूल
सजदे
में
आ
उतरते
हैं
वो
हैं
इक
ख़्वाब
इक
तसव्वुर
हैं
उनकी
ख़ातिर
मलक
सँवरते
हैं
वो
है
फ़िरदौस
मेरे
आलम
की
चाँद
तारे
वहाँ
उभरते
हैं
उनका
एहसास
आसमानी
है
वो
ज़मीं
पे
क़दम
न
धरते
हैं
है
उन्हीं
का
रुसूख़
ऐ
अकरम
इश्क़
हम
बेवजह
न
करते
हैं
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Mohammad Akram
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