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Amaan mirza
sui men dhaaga daala maine
sui men dhaaga daala maine | सुई में धागा डाला मैंने
- Amaan mirza
सुई
में
धागा
डाला
मैंने
ऐसे
सुई
को
सम्भाला
मैंने
कर्ज़
इसका
तुम
कैसे
चुकाओगे
मेरे
बेटे
तुम्हें
पाला
मैंने
जिस
कसरत
से
बुना
फिर
सुलझाया
उतनी
शिद्दत
से
जाला
मैंने
तेरे
इश्क़
में
है
दीवानों
सा
हाल
पहनी
है
पत्थर
की
माला
मैंने
अंदर
सड़
चुकी
ख़्वाबों
की
लाश
फिर
तोड़ा
दिल
का
ताला
मैंने
मैंने
पहले
ढूँढी
ज़हर
की
झील
फिर
दर-दर
ढूँढा
प्याला
मैंने
कालिख
उभर
आई
रोज़-ए-शनिवार
जब
कुर्ता
पहना
काला
मैंने
- Amaan mirza
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हमारे
जैसा
कोई
दर-ब-दर
नहीं
होगा
कहीं
पे
होगा
भी
तो
इस
कदर
नहीं
होगा
निकल
गया
हूँ
क़ज़ा
के
परे
तो
मैं
कबका
दे
जहर
भी
कोई
तो
अब
असर
नहीं
होगा
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Aadi Ratnam
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ख़ुद-कुशी
करने
में
भी
नाकाम
रह
जाते
हैं
हम
कौन
अमृत
घोल
देता
है
हमारे
ज़हर
में
Anjum Ludhianvi
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जो
ज़हर
पी
चुका
हूँ
तुम्हीं
ने
मुझे
दिया
अब
तुम
तो
ज़िन्दगी
की
दुआएँ
मुझे
न
दो
Ahmad Faraz
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कुछ
तो
मिल
जाए
लब-ए-शीरीं
से
ज़हर
खाने
की
इजाज़त
ही
सही
Arzoo Lakhnavi
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शायद
अगली
इक
कोशिश
तक़दीर
बदल
दे
ज़हर
तो
जब
जी
चाहे
खाया
जा
सकता
है
Siraj Faisal Khan
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यूँँ
तो
रुस्वाई
ज़हर
है
लेकिन
इश्क़
में
जान
इसी
से
पड़ती
है
Fahmi Badayuni
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गुलाब
ख़्वाब
दवा
ज़हर
जाम
क्या
क्या
है
मैं
आ
गया
हूँ
बता
इंतिज़ाम
क्या
क्या
है
Rahat Indori
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मैं
ख़ुदा
का
नाम
ले
कर
पी
रहा
हूँ
दोस्तो
ज़हर
भी
इस
में
अगर
होगा
दवा
हो
जाएगा
Bashir Badr
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यूँँ
तो
मरने
के
लिए
ज़हर
सभी
पीते
हैं
ज़िंदगी
तेरे
लिए
ज़हर
पिया
है
मैं
ने
Khalilur Rahman Azmi
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ख़ुद-कुशी
के
लिए
थोड़ा
सा
ये
काफ़ी
है
मगर
ज़िंदा
रहने
को
बहुत
ज़हर
पिया
जाता
है
Azhar Inayati
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घेर
लेता
है
बुरा
वक़्त
मुझे
याद
जब
करता
हूँ
पिछली
बातें
नशे
में
धुत
ये
ज़बाँ
रहती
है
सारा
दिन
करता
हूँ
बहकी
बातें
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Amaan mirza
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तुम्हारे
साथ
में
जो
गुज़री
थी
वो
ज़िंदगी
थी
तुम्हारे
बाद
ये
क्या
ज़िंदगी
है?
बिल्कुल
नइँ
ख़मोश
रहने
की
आदत
सी
हो
गई
है
मुझे
भला
ख़मोशी
कभी
बोलती
है?
बिल्कुल
नइँ
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Amaan mirza
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मुझे
भी
इस
क़दर
तुझ
सेे
मोहब्बत
है
के
जितनी
दरिया
से
मछली
को
उल्फ़त
है
किसी
ने
मुझ
सेे
पूछा
के
वफ़ा
क्या
है
वफ़ा
ईमानदारी
की
ज़मानत
है
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Amaan mirza
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इतना
मत
इतरा
अपने
रख़्त
के
साथ
धँस
न
जाए
कहीं
तू
तख़्त
के
साथ
ज़्यादा
की
भूख
मार
डालेगी
ज़िंदगी
जीना
सीख
लख़्त
के
साथ
सब्र
का
हाथ
थाम
के
चलना
बाक़ी
सब
कुछ
मिलेगा
बख़्त
के
साथ
ये
रिवायत
हदीसों
में
है
लिखी
नर्मी
से
पेश
आओ
सख़्त
के
साथ
बाग़
उजड़ने
पे
बाग़बाँ
रोया
पंछी
रोते
रहे
दरख़्त
के
साथ
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Amaan mirza
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नहीं
आसान
इंसाँ
हो
के
हर
इक
की
ख़बर
रखना
बहुत
सारे
त'अल्लुक़
टूट
जाते
हैं
तग़ाफुल
में
Amaan mirza
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