labon ko sii ke har dam peeta hooñ khoon-e-jigar apna | लबों को सी के हर दम पीता हूँ ख़ून-ए-जिगर अपना

  - MIR SHAHRYAAR
लबोंकोसीकेहरदमपीताहूँख़ून-ए-जिगरअपना
दर-ओ-दीवारसेअबफोड़ताहूँयारोसरअपना
किसेमुजरिमकहूँकिसकोसज़ादूँदिल-ए-मुंसिफ़
ख़ुदअपनेहाथोंसेमैंनेजलायाहैयेघरअपना
अभीइनकहकशाओंसेबहुतआगेगुज़रनाहै
यूँँहीचलतारहेबसशबकेतारोसफ़रअपना
यूँँदर्द-ए-दिलसुनानेकोफ़सानेहैंबहुतलेकिन
उसेफ़ुर्सतकहाँरखनाहैक़िस्सामुख़्तसरअपना
किसीसेक्यागिलारक्खेंकिसीसेक्याशिकायतहो
जिसेआनाहोजाएँखुलारहताहैदरअपना
कोईउम्मीदक्यारक्खेंइलाज-ए-दर्द-ए-उल्फ़तकी
किख़ुदभीइसमरज़मेंमुब्तलाहैचारा-गरअपना
गुज़रतेवक़्तकीधुननेभीधुँधलाएनहींमंज़र
हराहोतारहापलपलवोयादोंकाशजरअपना
मैंशीशाहूँसुनाहैतूभीशीशोंकामसीहाहै
लोआयाटूटकेमैंअबदिखादेतूहुनरअपना
  - MIR SHAHRYAAR
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