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Manoj Devdutt
ab shayar ki sarhad kab hoti hai
ab shayar ki sarhad kab hoti hai | अब शायर की सरहद कब होती है
- Manoj Devdutt
अब
शायर
की
सरहद
कब
होती
है
उसकी
महफ़िल
दुनिया
सब
होती
है
माँ
मुझको
सब
सेे
प्यारी
लगती
है
माँ
मेरी
दुनिया
मेरा
रब
होती
है
- Manoj Devdutt
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ये
ज़िंदगी
भी
अजब
कारोबार
है
कि
मुझे
ख़ुशी
है
पाने
की
कोई
न
रंज
खोने
का
Javed Akhtar
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ये
किस
ने
फ़ोन
पे
दी
साल-ए-नौ
की
तहनियत
मुझ
को
तमन्ना
रक़्स
करती
है
तख़य्युल
गुनगुनाता
है
Ali Sardar Jafri
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ख़ुशी
में
भी
ख़ुशी
होती
नहीं
अब
तेरा
ग़म
ही
सतह
पर
तैरता
है
Umesh Maurya
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ये
उसकी
मेहरबानी
है
वो
घर
में
ही
सँवरती
है
निकल
आए
जो
महफ़िल
में
तो
क़त्ल-ए-आम
हो
जाए
Ashraf Jahangeer
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ग़म
और
ख़ुशी
में
फ़र्क़
न
महसूस
हो
जहाँ
मैं
दिल
को
उस
मक़ाम
पे
लाता
चला
गया
Sahir Ludhianvi
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इन्हीं
ग़म
की
घटाओं
से
ख़ुशी
का
चाँद
निकलेगा
अँधेरी
रात
के
पर्दे
में
दिन
की
रौशनी
भी
है
Akhtar Shirani
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किस
की
होली
जश्न-ए-नौ-रोज़ी
है
आज
सुर्ख़
मय
से
साक़िया
दस्तार
रंग
Imam Bakhsh Nasikh
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हो
न
हो
एक
ही
तस्वीर
के
दो
पहलू
हैं
रक़्स
करता
हुआ
तू
आग
में
जलता
हुआ
मैं
Shahid Zaki
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क़ुबूल
है
जिन्हें
ग़म
भी
तेरी
ख़ुशी
के
लिए
वो
जी
रहे
हैं
हक़ीक़त
में
ज़िन्दगी
के
लिए
Nasir Kazmi
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पहले-पहल
तो
लड़
लिए
अल्लाह
से
मगर
अब
पेश
आ
रहे
हैं
बड़ी
आजिज़ी
से
हम
Amaan Pathan
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दिल
और
जान
से
नहीं
गया
फिर
इस
मकान
से
नहीं
गया
अब
वो
नज़र
मिला
नहीं
रहा
यानी
कि
शान
से
नहीं
गया
कुंडल
उतार
तो
दिया
गया
पर
छेद
कान
से
नहीं
गया
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Manoj Devdutt
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फिर
मार
देती
तीर
मुझको
करना
था
जब
नकीर
मुझको
माँ
बाप
साथ
रह
रहे
हैं
फिर
रहने
दो
फ़क़ीर
मुझको
सब
एक
हों
जहाँ
में
ऐसी
है
खींचनी
लकीर
मुझको
पीतल
सही
बना
रहूँ
बस
होना
नहीं
नज़ीर
मुझको
इंसान
ही
बना
रहूँ
अब
होना
नहीं
कबीर
मुझको
सब
काम
हों
मनोज
के
बस
होना
नहीं
वज़ीर
मुझको
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Manoj Devdutt
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उम्मीदें
इंतिज़ार
और
जुदाई
इनसे
मिलकर
बनती
है
तन्हाई
आशिक़
को
आदत
होनी
चाहिए
ये
उसके
हिस्से
में
है
बस
रुसवाई
मैं
सब
रम्ज़
समझ
जाता
हूँ
उसके
फिर
भी
करने
देता
हूँ
बे-वफ़ाई
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Manoj Devdutt
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ख़ुद
को
तो
सब
सही
दिखाते
हैं
आइने
को
सभी
सताते
हैं
बाप
परवाह
करते
हैं
सबकी
बाप
परवाह
कब
जताते
हैं
पेज
तो
अब
बदल
रहे
हैं
पर
चित्र
हम
एक
ही
बनाते
हैं
एक
लड़की
हुई
नहीं
मेरी
फिर
कहाँ
ख़ुद
को
हम
सजाते
हैं
हमने
जिनको
दिखाई
थी
दुनिया
आँख
हमको
वही
दिखाते
हैं
आग
जिनको
बुझानी
थी
प्यारे
आग
अब
बस
वही
लगाते
हैं
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Manoj Devdutt
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कुछ
भूलता
ही
तो
नहीं
हूँ
मैं
क्या
कम
सज़ा
दी
है
ख़ुदा
ने
मुझे
Manoj Devdutt
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