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Manish Yadav
dar tha ki doob jaoon na main aankh men tiri
dar tha ki doob jaoon na main aankh men tiri | डर था कि डूब जाऊॅं न मैं आँख में तिरी
- Manish Yadav
डर
था
कि
डूब
जाऊॅं
न
मैं
आँख
में
तिरी
देखा
जो
एक
बार
तो
तकता
ही
रह
गया
- Manish Yadav
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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पहले
सौ
बार
इधर
और
उधर
देखा
है
तब
कहीं
डर
के
तुम्हें
एक
नज़र
देखा
है
Majrooh Sultanpuri
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और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
Siddharth Saaz
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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तो
क्या
उसको
मैं
होंठों
से
बजाऊँ
तिरे
दर
पे
जो
घंटी
लग
गई
है
चराग़
उसने
मिरे
लौटा
दिए
हैं
अब
उसके
घर
में
बिजली
लग
गई
है
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Fahmi Badayuni
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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परिंद
क्यूँँ
मिरी
शाख़ों
से
ख़ौफ़
खाते
हैं
कि
इक
दरख़्त
हूँ
और
साया-दार
मैं
भी
हूँ
Asad Badayuni
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अस्ल
में
पाया
ही
'दानिश'
तब
उसे
जब
उसे
खोने
का
डर
जाता
रहा
Madan Mohan Danish
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हुआ
था
तय
नहीं
कुछ
भी
मुहब्बत
में
मनाएँगे
नहीं
तुमको
अगर
रूठे
Manish Yadav
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राह
का
रह-गुज़र
ही
निकला
वो
मैंने
समझा
था
हम-सफ़र
उसको
Manish Yadav
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मुझे
ही
चाहता
है
मुद्दतों
से
वरना
फिर
रक़ीब
तक
के
तिरे
हम
मुकरने
वाले
थे
ये
उसका
घर
है
यहीं
पे
कहीं
पे
यारों
सो
नहीं
तो
शहरस
कब
के
निकलने
वाले
थे
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Manish Yadav
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कुछ
ऐसा
हो
के
तू
मुझे
और
मैं
तुझे
देखूँ
रख
ले
तु
मुझे
पास
इक
आईना
बना
के
Manish Yadav
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जब
सुने
ही
नहीं
ग़म
मिरे
उसने
भी
फिर
सभी
से
ग़म
अपने
छुपाने
लगे
Manish Yadav
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