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Rohit Kumar Madhu Vaibhav
yaad kar roye ek aadh dukh-dard ham
yaad kar roye ek aadh dukh-dard ham | याद कर रोए एक आध दुख-दर्द हम
- Rohit Kumar Madhu Vaibhav
याद
कर
रोए
एक
आध
दुख-दर्द
हम
टूट
कर
गिर
गईं
डालियाँ
वर्द
हम
रात
भर
चुभती
इक
जिस्म
की
रौशनी
ओढ़
कर
सो
गए
एक
हम-दर्द
हम
कैसे
जी
पाएगा
दिल
हमारा
कहीं
है
मोहब्बत
सबा
जिस
के
पर्वर्द
हम
सूखते
फूल
पर
इत्र
छिड़के
कोई
हर
ग़ज़ल
आपकी
और
आवर्द
हम
इश्क़
में
जंग
में
सब
है
वाजिब
मगर
चाहते
नइँ
मोहब्बत
में
नावर्द
हम
- Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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इस
डर
से
किनारे
पे
उतर
जाना
था
क़िस्मत
में
लिखा
डूब
के
मर
जाना
था
दीवानगी
ले
डूबी
हमें
दुख
है
ये
उस
नाव
से
औरों
को
भी
घर
जाना
था
हम
एक
मुसाफ़िर
थे
यहाँ
धरती
पर
घर
थोड़ी
बनाना
था
गुज़र
जाना
था
बैठा
हूँ
उदासी
के
यहाँ
कब
से
मैं
सुनिए
ये
ख़ुशी
मुझको
इधर
जाना
था
जब
से
'मधु'
कुछ
हाथ
लगी
है
मेरे
सब
भूल
गया
हूॅं
कि
किधर
जाना
था
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उसकी
शादी
की
मुबारकबाद
दी
है
मैंने
तो
शे'र
तो
उस
सेे
हुआ
है
दाद
दी
है
मैंने
तो
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चाहते
थे
इश्क़
में
तो
कम
से
कम
निकले
यार
कैसे
और
किस
विष
से
ये
दम
निकले
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एक
जोड़ी
थी
ख़रीदी
मैंने
पायल
एक
उसके
पाँव
में
है
एक
माँ
के
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जिस्म
तोड़ती
है
पास
की
मोहब्बत
कोई
है
मोहब्बत
तो
वो
दूर
अच्छी
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