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Rohit Kumar Madhu Vaibhav
is dar se kinaare pe utar jaana tha
is dar se kinaare pe utar jaana tha | इस डर से किनारे पे उतर जाना था
- Rohit Kumar Madhu Vaibhav
इस
डर
से
किनारे
पे
उतर
जाना
था
क़िस्मत
में
लिखा
डूब
के
मर
जाना
था
दीवानगी
ले
डूबी
हमें
दुख
है
ये
उस
नाव
से
औरों
को
भी
घर
जाना
था
हम
एक
मुसाफ़िर
थे
यहाँ
धरती
पर
घर
थोड़ी
बनाना
था
गुज़र
जाना
था
बैठा
हूँ
उदासी
के
यहाँ
कब
से
मैं
सुनिए
ये
ख़ुशी
मुझको
इधर
जाना
था
जब
से
'मधु'
कुछ
हाथ
लगी
है
मेरे
सब
भूल
गया
हूॅं
कि
किधर
जाना
था
- Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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कुछ
यूँँ
है
तेरे
जिस्म
पर
रंगीन
तिल
बेरी
लगे
हैं
फूल
जैसी
झाड़
पर
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क्या
और
चाहिए
मेरी
जान
के
सिवा
सब
कुछ
पड़ा
हुआ
गिरवी
जान
के
सिवा
दिल
है
मेरा
किसी
का
पहले
ही
और
तुम
क्या
माँस
का
करोगी
भी
जान
के
सिवा
दिल
से
निकल
गई
हो
तुम
और
फिर
तो
क्या
अपनी
भी
जान
निकलेगी
जान
के
सिवा
मैं
क्यूँँॅं
उतावला
हूँ
इक
मौत
के
लिए
बस
एक
ही
तो
है
साथी
जान
के
सिवा
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चाहते
थे
इश्क़
में
तो
कम
से
कम
निकले
यार
कैसे
और
किस
विष
से
ये
दम
निकले
Rohit Kumar Madhu Vaibhav
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उसकी
शादी
की
मुबारकबाद
दी
है
मैंने
तो
शे'र
तो
उस
सेे
हुआ
है
दाद
दी
है
मैंने
तो
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याद
कर
रोए
एक
आध
दुख-दर्द
हम
टूट
कर
गिर
गईं
डालियाँ
वर्द
हम
रात
भर
चुभती
इक
जिस्म
की
रौशनी
ओढ़
कर
सो
गए
एक
हम-दर्द
हम
कैसे
जी
पाएगा
दिल
हमारा
कहीं
है
मोहब्बत
सबा
जिस
के
पर्वर्द
हम
सूखते
फूल
पर
इत्र
छिड़के
कोई
हर
ग़ज़ल
आपकी
और
आवर्द
हम
इश्क़
में
जंग
में
सब
है
वाजिब
मगर
चाहते
नइँ
मोहब्बत
में
नावर्द
हम
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