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MAHESH CHAUHAN NARNAULI
hausla
hausla | "हौसला"
- MAHESH CHAUHAN NARNAULI
"हौसला"
हौसला
रख
रास्ते
दिखने
लगेंगे
यह
अँधेरे
सुब्ह
तक
छटने
लगेंगे
क़ाफ़िले
पर
क़ाफ़िले
गुज़रे
यहाँ
से
देखना
कुछ
नक़्श-ए-पा
आगे
मिलेंगे
लड़-खड़ाते
हौसलों
को
फिर
उठा
कर
सुब्ह
होते
ही
सफ़र
पर
चल
पड़ेंगे
ठोकरों
से
कह
दो
के
दम-ख़म
लगा
दें
हम
गिरेंगे
फिर
उठेंगे
पर
चलेंगे
- MAHESH CHAUHAN NARNAULI
गर
बाज़ी
इश्क़
की
बाज़ी
है,
जो
चाहो
लगा
दो
डर
कैसा
गर
जीत
गए
तो
क्या
कहना,
हारे
भी
तो
बाज़ी
मात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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मुझे
दुश्मन
से
भी
ख़ुद्दारी
की
उम्मीद
रहती
है
किसी
का
भी
हो
सर
क़दमों
में
सर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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अच्छी
लड़की
ज़िद
नहीं
करते
देखो
इश्क़
बुरा
होता
है
Ali Zaryoun
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भारत
के
ऐ
सपूतो
हिम्मत
दिखाए
जाओ
दुनिया
के
दिल
पे
अपना
सिक्का
बिठाए
जाओ
Lal Chand Falak
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ज़माना
इश्क़
के
मारों
को
मात
क्या
देगा
दिलों
के
खेल
में
ये
जीत
हार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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ऐसा
नहीं
कि
उन
से
मोहब्बत
नहीं
रही
जज़्बात
में
वो
पहली
सी
शिद्दत
नहीं
रही
Khumar Barabankvi
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मैं
आँधियों
के
पास
तलाश-ए-सबा
में
हूँ
तुम
मुझ
से
पूछते
हो
मिरा
हौसला
है
क्या
Ada Jafarey
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चला
है
जोश
में
मक़्तल
की
ओर
जोशीला
उसी
को
देख
के
कितनों
को
अक़्ल
आई
है
Tarun Bharadwaj
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मुझे
यक़ीं
है
ये
ज़हमत
नहीं
करेगा
कोई
बिना
गरज़
के
मोहब्बत
नहीं
करेगा
कोई
न
ख़ानदान
में
पहले
किसी
ने
इश्क़
किया
हमारे
बाद
भी
हिम्मत
नहीं
करेगा
कोई
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Asad Taskeen
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किसी
से
छोटी
सी
एक
उम्मीद
बाँध
लीजिए
मोहब्बतों
का
अगर
जनाज़ा
निकालना
है
Shakeel Jamali
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ज़रा
खुल
के
जो
मुस्कुराने
पे
आए
ज़माने
के
हम
फिर
निशाने
पे
आए
शहंशाह
हो
या
कोई
आम
बंदा
जो
चाहे
मेरे
आस्ताने
पे
आए
कहाँ
ढूँढते
रहनुमा
शहर
में
तुम
सो
हम
ख़ुद
तुम्हारे
ठिकाने
पे
आए
उन्हें
क्या
कहें
जिनके
सर
हो
बुलंदी
उन्हें
अक़्ल
बस
मात
खाने
पे
आए
पता
जब
चला
बाप
की
अहमियत
का
जब
उनकी
तरह
हम
कमाने
पे
आए
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ज़िंदगी
तुझ
सेे
कोई
शिकायत
नहीं
जो
है
काफ़ी
है
ज़्यादा
की
हसरत
नहीं
देख
लेते
हैं
आँगन
से
उड़ते
जहाज़
गाँव
में
कोई
ऊँची
इमारत
नहीं
मैं
यक़ीनन
ये
दावे
से
कहता
हूँ
दोस्त
बेटियों
के
बिना
घर
में
बरकत
नहीं
तुम
बुज़ुर्गों
की
बातें
सुनोगे
अगर
तो
तुम्हारे
भटकने
की
नौबत
नहीं
सोच
कर
लूटना
तू
लुटेरे
मुझे
पास
मेरे
मोहब्बत
है
दौलत
नहीं
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बारिश
में
अक्सर
नाव
काग़ज़
की
बनाते
थे
मियाँ
इन
मौसमों
का
लुत्फ़
पहले
यूँॅं
उठाते
थे
मियाँ
अब
खिड़कियों
से
धूप
आती
है
तो
आँखें
खुलती
हैं
पहले
उजाले
से
भी
जल्दी
जाग
जाते
थे
मियाँ
है
मुँह-ज़बानी
याद
गुज़रे
दौर
के
किस्से
हमें
कैसे
कमाते
थे
कि
कैसे
घर
चलाते
थे
मियाँ
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हुए
हैं
जब
से
ग़ाएब
ख़्वाब
आँखों
से
नज़र
आता
हूँ
मैं
बे-ताब
आँखों
से
डरा
सकता
नहीं
तूफ़ाँ
हमें
कोई
के
देखे
हैं
कई
सैलाब
आँखों
से
ख़िज़ाँ
ने
जो
उजाड़ा
है
चमन
मेरा
ख़ुदा
कर
दे
उसे
शादाब
आँखों
से
रुके
अश्कों
का
इक
तालाब
है
मुझ
में
निकल
जाए
वही
तालाब
आँखों
से
बताते
हैं
यही
ता'रीफ़
में
उसकी
हमारा
यार
है
नायाब
आँखों
से
तेरे
हाथों
पिए
पानी
से
भी
साक़ी
नज़र
आए
कई
महताब
आँखों
से
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नींद
आती
है
जिस
घड़ी
साहब
शब
गुज़र
जाती
है
मेरी
साहब
झूट
कहना
भी
ठीक
होता
है
आदमी
का
कभी-कभी
साहब
मैं
सॅंभाले
हुए
हूॅं
सालों
से
बाप
की
दी
हुई
घड़ी
साहब
चोट
यूँॅं
तो
बहुत
पुरानी
है
पर
ये
दुखती
है
आज
भी
साहब
काम
सारा
निकल
गया
हम
से
अब
हमारी
किसे
पड़ी
साहब
सिर्फ़
अपने
तलक
रखेंगे
हम
अपने
आपस
की
दुश्मनी
साहब
बाप
मुफ़लिस
था
फिर
भी
उसने
मेरे
शौक़
पूरे
किए
सभी
साहब
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