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Sanjay Vyas 'Sahiba'
maine likha hai KHud hi ye muqaddar
maine likha hai KHud hi ye muqaddar | मैंने लिखा है ख़ुद ही ये मुक़द्दर
- Sanjay Vyas 'Sahiba'
मैंने
लिखा
है
ख़ुद
ही
ये
मुक़द्दर
हाथों
की
लकीरें
मिटा
दी
मैं
ने
- Sanjay Vyas 'Sahiba'
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कभी
मैं
अपने
हाथों
की
लकीरों
से
नहीं
उलझा
मुझे
मालूम
है
क़िस्मत
का
लिक्खा
भी
बदलता
है
Bashir Badr
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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किसी
को
साल-ए-नौ
की
क्या
मुबारकबाद
दी
जाए
कैलन्डर
के
बदलने
से
मुक़द्दर
कब
बदलता
है
Aitbar Sajid
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कभी
पत्थर
मुक़द्दर
लिख
नहीं
सकता
मगर
समझो
जिसे
पत्थर
में
ढूँढो
हो
तुम्हारे
पास
ही
तो
है
Tanha
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कुछ
एक
की
हम
जैसी
क़िस्मत
होती
है
बाकी
सब
की
अच्छी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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फिर
एक
रोज़
मुक़द्दर
से
हार
मानी
गई
ज़बीन
चूम
के
बोला
गया
"ख़ुदा
हाफ़िज़"
Afkar Alvi
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मैं
ने
मेहनत
से
हथेली
पे
लकीरें
खींचीं
वो
जिन्हें
कातिब-ए-तक़दीर
नहीं
खींच
सका
Umair Najmi
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ख़्वाहिश
सब
रखते
हैं
तुझको
पाने
की
और
फिर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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मेरी
क़िस्मत
कि
ये
दुनिया
मुझे
पहचानती
है
लोग
मर
जाते
हैं
पहचान
बनाने
के
लिए
Nadeem Farrukh
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ख़ुश
रहते
हैं
हँस
सकते
हैं
भोले
भाले
होते
हैं
वो
जो
शे'र
नहीं
कहते
हैं
क़िस्मत
वाले
होते
हैं
पीना
अच्छी
बात
नहीं
है
आते
हैं
समझाने
दोस्त
और
ढलते
ही
शाम
उन्हें
फिर
हमीं
सँभाले
होते
हैं
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Vineet Aashna
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उतना
बाक़ी
हूँ
मैं
ज़रा
सा
मुझ
में
जितना
बाक़ी
है
तेरा
आना
मुझ
में
उस
दिन
ख़ुद
को
छोड़
निकल
जाऊँगा
जब
पूरा
का
पूरा
तू
होगा
मुझ
में
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Sanjay Vyas 'Sahiba'
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इक
क़तरे
में
समुंदर
को
देखा
है
उस
की
आँख
में
आँसू
जो
देखा
है
Sanjay Vyas 'Sahiba'
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सारी
रस्में
बाक़ी
हैं
बस
इक
हाँ
की
देरी
है
Sanjay Vyas 'Sahiba'
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जो
देखी
तुम
ने
भी
कभी
होगी
नहीं
वो
इक
तेरी
तस्वीर
मेरे
पास
है
Sanjay Vyas 'Sahiba'
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कहने
को
बाज़ी
ये
बाज़ी
है
इश्क़
में
तेरे
हम
माँझी
है
इश्क़
क्या
है
पता
ही
नहीं
बात
कैसे
ज़ुबाँ
आती
है
कहने
को
बातें
है
तो
सही
सुनने
को
एक
नहीं
राज़ी
है
बात
करनी
कई
सारी
है
वक़्त
की
थोड़ी
सी
तेज़ी
है
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Sanjay Vyas 'Sahiba'
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