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Lalit Mohan Joshi
amaavas raat dekho poonam sii dikhti
amaavas raat dekho poonam sii dikhti | अमावस रात देखो पूनम सी दिखती
- Lalit Mohan Joshi
अमावस
रात
देखो
पूनम
सी
दिखती
यक़ीनन
वो
जगी
होगी
मेरी
ख़ातिर
- Lalit Mohan Joshi
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शब
जो
होली
की
है
मिलने
को
तिरे
मुखड़े
से
जान
चाँद
और
तारे
लिए
फिरते
हैं
अफ़्शाँ
हाथ
में
Mushafi Ghulam Hamdani
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रात
यूँँ
दिल
में
तिरी
खोई
हुई
याद
आई
जैसे
वीराने
में
चुपके
से
बहार
आ
जाए
Faiz Ahmad Faiz
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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घर
में
भी
दिल
नहीं
लग
रहा
काम
पर
भी
नहीं
जा
रहा
जाने
क्या
ख़ौफ़
है
जो
तुझे
चूम
कर
भी
नहीं
जा
रहा
रात
के
तीन
बजने
को
है
यार
ये
कैसा
महबूब
है
जो
गले
भी
नहीं
लग
रहा
और
घर
भी
नहीं
जा
रहा
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Tehzeeb Hafi
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आज
की
रात
दिवाली
है
दिए
रौशन
हैं
आज
की
रात
ये
लगता
है
मैं
सो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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ये
सर्द
रात
ये
आवारगी
ये
नींद
का
बोझ
हम
अपने
शहर
में
होते
तो
घर
चले
जाते
Ummeed Fazli
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रात
सोने
के
लिए
दिन
काम
करने
के
लिए
वक़्त
मिलता
ही
नहीं
आराम
करने
के
लिए
Jamal Ehsani
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कब
ठहरेगा
दर्द
ऐ
दिल
कब
रात
बसर
होगी
सुनते
थे
वो
आएँगे
सुनते
थे
सहर
होगी
Faiz Ahmad Faiz
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रात
का
इंतिज़ार
कौन
करे
आज
कल
दिन
में
क्या
नहीं
होता
Bashir Badr
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
खाक़
करेंगे
Asad Akbarabadi
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प्यार
तुम्हारा
गर
मिल
जाता
मेरा
चेहरा
फिर
खिल
जाता
हाथ
को
थामा
तुमने
जब
से
मैं
अपने
रब
से
मिल
जाता
बोसा
उसका
माथा
मेरा
मुझको
जैसे
सब
मिल
जाता
उसके
क़दम
जो
घर
में
पड़े
तो
मेरे
घर
को
घर
मिल
जाता
उसकी
ज़ुल्फ़ों
को
सुलझाकर
रस्ता
मंज़िल
का
मिल
जाता
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Lalit Mohan Joshi
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मुझे
जिस
पे
बहुत
ही
ग़ुरूर
था
बुरे
वक़्त
में
वो
मुझ
से
दूर
था
बताता
था
मुझे
जो
हर
एक
बात
मगर
आज
वही
शख़्स
दूर
था
मैं
हर
बात
पे
चुप
क्या
हुआ
यहाँ
वो
समझा
कि
मिरा
ही
क़ुसूर
था
कभी
दुनिया
से
उलझा
था
पहले
मैं
तभी
ख़ुद
से
यक़ीनन
मैं
दूर
था
मुक़द्दर
का
है
क़िस्सा
अजीब
सा
जिसे
अपना
कहा
वो
ही
दूर
था
मुहब्बत
भी
ये
क्या
सीख
दे
गई
'ललित'
हो
गया
आँखों
का
नूर
था
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Lalit Mohan Joshi
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कैसे
क्यूँँ
फिर
मैं
बिखरने
अब
लगा
हूँ
ख़ुद
के
अंदर
से
ही
मरने
अब
लगा
हूँ
चाँद
तारे
सबके
किस्से
कहता
हूँ
मैं
चेहरे
पर
मुस्कान
धरने
अब
लगा
हूँ
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Lalit Mohan Joshi
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इक
कहानी
को
बयाँ
करने
लगा
हूँ
मैं
ज़मीं
को
आसमाँ
करने
लगा
हूँ
रोज़
काँटों
की
चुभन
सहता
गया
मैं
ख़ुद
को
बे-नाम-ओ-निशाँ
करने
लगा
हूँ
हाथ
में
सिगरेट
को
मैंने
ले
लिया
है
ज़िंदगी
को
मैं
धुआँ
करने
लगा
हूँ
चोट
दुनिया
कर
रही
मासूम
दिल
में
मैं
तो
फिर
भी
नेकियाँ
करने
लगा
हूँ
मुझको
नश्तर
की
चुभन
मिलती
रही
है
ज़िंदगी
को
ख़ुद
ख़िज़ाँ
करने
लगा
हूँ
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Lalit Mohan Joshi
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मिलने
ख़ातिर
ख़ूब
दुआएँ
करती
है
यानी
मुझ
सेे
मिल
के
चमकना
चाहती
है
Lalit Mohan Joshi
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