lazzat-e-gham ko zamaana yuñ badhaata hai | लज़्ज़त-ए-ग़म को ज़माना यूँँ बढ़ाता है

  - Lalit Mohan Joshi
लज़्ज़त-ए-ग़मकोज़मानायूँँबढ़ाताहै
तोड़करदिलकोवोजैसेमुस्कुराताहै
मेरादामनतोबड़ाहीपाकहैयारो
येज़मानाकिसलिएतोहमतलगाताहै
मानताहूँमैंयहाँख़ुदकोअमीर-ए-दिल
मुफ्लिसीमेंदिनमगरयेकटहीजाताहै
बातकोकहनेसेडरताहैयहाँकितना
रोज़दुनियासेनईवोमातखाताहै
अबसमुंदरकोतलबहैयारपानीकी
इसलिएआवाज़मुझकोवोलगाताहै
  - Lalit Mohan Joshi
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