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Lalit Mohan Joshi
dard kuchh yuñ badh gaya hai
dard kuchh yuñ badh gaya hai | दर्द कुछ यूँँ बढ़ गया है
- Lalit Mohan Joshi
दर्द
कुछ
यूँँ
बढ़
गया
है
आँखों
से
दरिया
बहा
है
आ
गए
किस
मोड़
पर
अब
सिल
लबों
को
अब
लिया
है
फिर
मगर
क़िस्सा
सुनो
अब
रोज़
माँगी
इक
दु'आ
है
मिल
गया
राही
हमें
जब
फिर
नहीं
रहता
ख़फ़ा
है
बातें
करता
है
बहुत
ही
चुप
नहीं
क्यूँ
हो
रहा
है
गाँव
है
सुंदर
बड़ा
फिर
शहरस
रहता
जुदा
है
हम
लिखेंगे
आज
क़िस्सा
दोस्ती
को
रब
लिखा
है
प्यार
से
रहना
सिखाया
प्यार
ही
सब
कुछ
लिखा
है
हम
समुंदर
में
नहीं
हैं
हमने
उसको
भी
पढ़ा
है
आँखों
से
आँसू
बहे
हैं
दर्द
का
मतलब
दवा
है
रात
गहरी
हो
रही
है
वो
ग़ज़ल
इक
लिख
सका
है
घर
के
परदे
गिर
गए
हैं
याद
दिल
ने
फिर
किया
है
यार
चादर
है
मुड़ी
जो
कौन
दिल
को
भा
गया
है
वो
हमें
फिर
क्यूँ
रुलाता
दूर
जब
उसने
किया
है
- Lalit Mohan Joshi
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धूप
के
एक
ही
मौसम
ने
जिन्हें
तोड़
दिया
इतने
नाज़ुक
भी
ये
रिश्ते
न
बनाये
होते
Waseem Barelvi
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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नहीं
हर
चंद
किसी
गुम-शुदा
जन्नत
की
तलाश
इक
न
इक
ख़ुल्द-ए-तरब-नाक
का
अरमाँ
है
ज़रूर
बज़्म-ए-दोशंबा
की
हसरत
तो
नहीं
है
मुझ
को
मेरी
नज़रों
में
कोई
और
शबिस्ताँ
है
ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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नए
साल
में
पिछली
नफ़रत
भुला
दें
चलो
अपनी
दुनिया
को
जन्नत
बना
दें
Unknown
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अगर
जन्नत
मिला
करती
फ़क़त
सज्दों
के
बदले
में
तो
फिर
इबलीस
मुर्शिद
सब
सेे
पहले
जन्नती
होता
Shajar Abbas
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जिस
मौसम
में
भीगना
है
हम
दोनों
को
उस
मौसम
में
पूछ
रही
हो
छाता
है
Zubair Alam
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यहाँ
तुम
देखना
रुतबा
हमारा
हमारी
रेत
है
दरिया
हमारा
Kushal Dauneria
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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करती
है
तो
करने
दे
हवाओं
को
शरारत
मौसम
का
तकाज़ा
है
कि
बालों
को
खुला
छोड़
Abrar Kashif
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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खिड़कियाँ
खोल
सुब्ह
होने
को
है
चाँद
भी
यार
अब
तो
सोने
को
है
उड़
चुके
हैं
परिंदे
भी
अब
तो
साँस
फसलें
नई
ये
बोने
को
है
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Lalit Mohan Joshi
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मुश्क
आने
मौत
की
मुझको
लगी
इश्क़
दुनिया
करने
ही
मुझको
लगी
क्या
कहूँ
मैं
ऐसी
नादानी
को
अब
प्यार
में
फिर
छलने
भी
मुझको
लगी
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Lalit Mohan Joshi
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मौत
ख़ामोशी
से
बैठी
पास
मेरे
इसलिए
शायद
लगे
ये
ग़म
के
फेरे
बाँटता
फिरता
हूँ
अपना
दर्द
सब
से
पर
कहाँ
ज़ख़्मों
को
मरहम
मिलता
मेरे
इक
नहीं
सौ
सौ
सवालों
से
घिरा
हूँ
उस
में
से
शायद
न
जाने
कितने
तेरे
बन
के
ज़िंदा
लाश
हूँ
देखो
मैं
ऐसे
जैसे
तन
लूटे
तवायफ़
के
लुटेरे
इक
नदी
है
दूर
मुझ
सेे
क्यूँँ
ख़फ़ा
है
क्यूँँ
नहीं
होते
अँधेरे
के
सवेरे
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Lalit Mohan Joshi
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मेरी
क़िस्मत
लौट
आई
पास
मेरे
देखना
अब
काम
होंगे
ख़ास
मेरे
नींद
से
मैं
दोस्तो
जबसे
जगा
हूँ
हैं
अधूरे
ख़्वाब
सब
बे-आस
मेरे
ग़ैर
के
आग़ोश
में
वो
है
वहाँ
पर
जाग
भी
जा
अब
यहाँ
अब्बास
मेरे
अब
किनारा
कर
रहे
हैं
लोग
यानी
जीत
के
होने
लगे
आभास
मेरे
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Lalit Mohan Joshi
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आख़िरी
मुलाक़ात
याद
है
दोस्त
क्यूँ
वो
सब
बात
याद
है
दर्द
देख
कितना
दिया
मुझे
दोस्त
क्यूँ
वो
हर
रात
याद
है
याद
है
दिसंबर
बहुत
मुझे
सर्द
वो
मुझे
रात
याद
है
कैसे
यार
उसने
छुआ
मुझे
यार
वो
मुझे
घात
याद
है
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Lalit Mohan Joshi
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