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Lalit Mohan Joshi
dard apna aap hi ab leejiyega
dard apna aap hi ab leejiyega | दर्द अपना आप ही अब लीजिएगा
- Lalit Mohan Joshi
दर्द
अपना
आप
ही
अब
लीजिएगा
कोई
ऐसा
काम
तो
फिर
कीजिएगा
ज़ख़्म
सीने
पर
यूँँ
खाए
रोज़
सौ
सौ
ज़हर
को
हर
रोज़
अब
तो
पीजिएगा
ख़्वाब
की
ख़ातिर
जगे
है
रात
भर
ये
सो
अँधेरे
से
यूँँ
अब
लड़
लीजिएगा
ठीक
होगा
सब
यहाँ
पर
एक
दिन
तो
कर
भरोसा
अब
ख़ुदा
पर
लीजिएगा
- Lalit Mohan Joshi
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शहर
के
अब
शोर
से
डर
लगता
है
हर
कोई
हमको
सितमगर
लगता
है
ज़ख़्म
ताज़ा
पहले
देता
है
यहाँ
फिर
कहे
वो
अपना
तो
डर
लगता
है
चाँद
जागा
रातभर
पूरी
यहाँ
आज
मानो
चाँद
बे-घर
लगता
है
जिस
गली
में
हो
मुकम्मल
हर
ग़ज़ल
उस
गली
का
रोज़
चक्कर
लगता
है
जो
बुलंदी
पे
पहुँच
जाता
यहाँ
सो
वही
दुनिया
को
ख़ुशतर
लगता
है
जीत
से
मेरी
वो
जलने
वाले
हाए
खेल
से
वो
यार
बाहर
लगता
है
मुश्किलों
में
है
बचाया
उसको
फिर
गर
ज़बाँ
खोले
तो
बद-तर
लगता
है
साल
बीते
पाँच
दिल्ली
शहर
में
ये
बड़ा
मुझको
फ़ुसूँ-गर
लगता
है
ख़ुद-कुशी
जो
मुफ़्लिसी
में
कर
गया
वो
मगर
लड़का
सुख़न-वर
लगता
है
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ज़बाँ
पर
आबला
इक
बा-ख़ुदा
है
वही
हर
साँस
को
था
में
हुआ
है
मैं
रिश्तों
को
निभाता
ही
रहा
हूँ
मुझे
हर
रोज़
लेकिन
ग़म
मिला
है
मिरा
इस
शहर
में
अब
जी
नहीं
है
मगर
घर
के
लिए
घर
छोड़ना
है
टंगा
पंखे
पे
होता
वो
किसी
दिन
मगर
घर
का
वो
बेटा
इक
बड़ा
है
तुम्हें
काजल
दिखा
जो
आँख
उसकी
वही
मेरी
ग़ज़ल
का
क़ाफ़िया
है
ख़ुदा
जब
सोचता
है
तेरी
ख़ातिर
यहाँ
तू
किसलिए
इतना
डरा
है
बुलंदी
पर
ललित
को
देखकर
के
ज़माना
तो
परेशाँ
सा
हुआ
है
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आपके
हुस्न
से
मैं
कही
खो
गया
आइने
को
भुला
आपका
हो
गया
हूर
हो
या
परी
पाक
जैसे
हो
मन
आपको
पढ़
के
मैं
हो
ग़ज़ल-गो
गया
आँख
उसकी
है
क्या
मैं
बताऊँ
भी
क्या
मैं
उसे
देखकर
दूर
सा
हो
गया
इक
दिया
आपको
मानता
हूँ
यहाँ
आपके
आने
भर
से
ये
तम
खो
गया
जो
मिली
आपकी
ये
मुहब्बत
अगर
तो
ललित
आपका
आपका
हो
गया
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फूल
मुरझा
अब
गया
है
काट
जब
वो
डाल
दी
है
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इक
कहानी
को
बयाँ
करने
लगा
हूँ
मैं
ज़मीं
को
आसमाँ
करने
लगा
हूँ
रोज़
काँटों
की
चुभन
सहता
गया
मैं
ख़ुद
को
बे-नाम-ओ-निशाँ
करने
लगा
हूँ
हाथ
में
सिगरेट
को
मैंने
ले
लिया
है
ज़िंदगी
को
मैं
धुआँ
करने
लगा
हूँ
चोट
दुनिया
कर
रही
मासूम
दिल
में
मैं
तो
फिर
भी
नेकियाँ
करने
लगा
हूँ
मुझको
नश्तर
की
चुभन
मिलती
रही
है
ज़िंदगी
को
ख़ुद
ख़िज़ाँ
करने
लगा
हूँ
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