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Lalit Mohan Joshi
chhat pe meraa chaand aaya hai
chhat pe meraa chaand aaya hai | छत पे मेरा चाँद आया है
- Lalit Mohan Joshi
छत
पे
मेरा
चाँद
आया
है
उसका
मुझको
दाग़
भाया
है
आज
कैसे
हो
अँधेरा
फिर
चाँदनी
ने
दिल
चुराया
है
इक
अदा
ने
उसकी
मुझको
तो
हर
मरज़
से
फिर
बचाया
है
दोस्त
अब
जीने
न
देंगे
सब
सबने
पत्थर
बन
रुलाया
है
चोट
पर
फिर
चोट
खाने
से
इक
फ़साना
अब
कमाया
है
आसमाँ
को
देखता
है
वो
दर्द
यूँँ
उसने
छुपाया
है
उसको
शायद
काम
करने
है
इस
लिए
दिल
को
लगाया
है
मौत
ग़म
हो
और
क्या
क्या
है
सबने
दिल
को
फिर
दुखाया
है
अब
'ललित'
ख़ामोश
इतना
है
सबको
हँसते
ही
दिखाया
है
- Lalit Mohan Joshi
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नौकरी
के
फेर
में
फिर
खो
गया
लड़का
ज़िंदगी
से
ज़ेर
ऐसे
हो
गया
लड़का
यार
क्यूँँ
वो
आ
गया
फिर
शहर
बेटा
तो
डाँट
से
वो
बॉस
की
यूँँ
सो
गया
लड़का
गाँव
में
जो
रौब
से
चलता
था
यारो
पर
शहर
में
क्यूँँ
फिर
वो
सहमा
हो
गया
लड़का
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क्या
बताते
रात
ग़म
की
हम
हो
रही
बारिश
जो
बे-मौसम
टूटते
हम
रह
गए
हर
पल
आँख
जब
होती
रही
पुर-नम
सिलसिला
क्या
हो
रहा
है
अब
दर्द
का
अब
है
नहीं
मरहम
चल
दिए
हम
यार
किस
रस्ते
मिल
रहे
हैं
अब
बहुत
ही
ग़म
रौशनी
की
थी
तलब
हमको
हो
गई
फिर
तो
नज़र
भी
कम
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प्यार
तुम्हारा
गर
मिल
जाता
मेरा
चेहरा
फिर
खिल
जाता
हाथ
को
थामा
तुमने
जब
से
मैं
अपने
रब
से
मिल
जाता
बोसा
उसका
माथा
मेरा
मुझको
जैसे
सब
मिल
जाता
उसके
क़दम
जो
घर
में
पड़े
तो
मेरे
घर
को
घर
मिल
जाता
उसकी
ज़ुल्फ़ों
को
सुलझाकर
रस्ता
मंज़िल
का
मिल
जाता
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मुझे
जिस
पे
बहुत
ही
ग़ुरूर
था
बुरे
वक़्त
में
वो
मुझ
से
दूर
था
बताता
था
मुझे
जो
हर
एक
बात
मगर
आज
वही
शख़्स
दूर
था
मैं
हर
बात
पे
चुप
क्या
हुआ
यहाँ
वो
समझा
कि
मिरा
ही
क़ुसूर
था
कभी
दुनिया
से
उलझा
था
पहले
मैं
तभी
ख़ुद
से
यक़ीनन
मैं
दूर
था
मुक़द्दर
का
है
क़िस्सा
अजीब
सा
जिसे
अपना
कहा
वो
ही
दूर
था
मुहब्बत
भी
ये
क्या
सीख
दे
गई
'ललित'
हो
गया
आँखों
का
नूर
था
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कह
दिया
है
ज़िंदगी
से
अलविदा
कह
दिया
है
अब
हँसी
से
अलविदा
आज
फिर
पूछा
है
रोने
का
सबब
ज़िंदगी
पूरी
सभी
से
अलविदा
आ
गया
इस
मोड़
पर
लगते
सभी
अब
पराए
सो
सभी
से
अलविदा
क्यूँँ
सहूँ
अब
बोझ
मैं
ये
ज़िंदगी
कह
रहा
हूँ
मैं
अभी
से
अलविदा
क्या
ललित
है
ये
बताना
है
नहीं
अब
चले
हम
सो
ख़ुशी
से
अलविदा
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