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Lalit Mohan Joshi
naukri ke fer men phir kho gaya ladka
naukri ke fer men phir kho gaya ladka | नौकरी के फेर में फिर खो गया लड़का
- Lalit Mohan Joshi
नौकरी
के
फेर
में
फिर
खो
गया
लड़का
ज़िंदगी
से
ज़ेर
ऐसे
हो
गया
लड़का
यार
क्यूँँ
वो
आ
गया
फिर
शहर
बेटा
तो
डाँट
से
वो
बॉस
की
यूँँ
सो
गया
लड़का
गाँव
में
जो
रौब
से
चलता
था
यारो
पर
शहर
में
क्यूँँ
फिर
वो
सहमा
हो
गया
लड़का
- Lalit Mohan Joshi
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ये
भी
अच्छा
हुआ
मौत
ने
आकर
हमको
बचा
लिया
वरना
हालत
ऐसी
थी,
हम
शायर
भी
हो
सकते
थे
Bhaskar Shukla
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हालत
जो
हमारी
है
तुम्हारी
तो
नहीं
है
ऐसा
है
तो
फिर
ये
कोई
यारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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गो
मैं
रहा
रहीन-ए-सितम-हा-ए-रोज़गार
लेकिन
तिरे
ख़याल
से
ग़ाफ़िल
नहीं
रहा
Mirza Ghalib
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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कब
करे
ये
दिल
मुहब्बत
नौकरी
दिन
खा
रही
है
Ravi 'VEER'
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मज़दूर
भले
सारी
ही
उम्र
करे
मेहनत
बेटी
की
विदाई
लायक़
पैसे
नहीं
होते
Amaan Pathan
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मुफ़लिसी
थी
और
हम
थे
घर
के
इकलौते
चराग़
वरना
ऐसी
रौशनी
करते
कि
दुनिया
देखती
Kashif Sayyed
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हम
सेे
मिलिए
नशे
की
हालत
में
बिन
पिए
होश
ही
नहीं
रहता
Harsh Kumar
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मेहनत
से
है
अज़्मत
कि
ज़माने
में
नगीं
को
बे-काविश-ए-सीना
न
कभी
नामवरी
दी
Bahadur Shah Zafar
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हँस
के
फ़रमाते
हैं
वो
देख
के
हालत
मेरी
क्यूँँ
तुम
आसान
समझते
थे
मोहब्बत
मेरी
Ameer Minai
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कौन
दे
आवाज़
उसको
अब
यहाँ
बोलता
ही
जब
नहीं
हो
अब
यहाँ
ग़ैर
के
वो
जब
गले
से
लग
गया
मात
उसकी
जैसे
तो
हो
अब
यहाँ
घर
के
दरवाज़े
सभी
कर
बंद
अब
शोर
लगता
यार
फिर
हो
अब
यहाँ
आँखें
करके
बंद
बैठा
पीर
इक
जैसे
करता
याद
रब
को
अब
यहाँ
आँखें
उसकी
याद
में
फूटीं
मगर
भा
गया
दुश्मन
उसे
तो
अब
यहाँ
मैं
भटकता
ख़ोज
में
जिसकी
यहाँ
दूर
ख़ुद
से
पाया
उसको
अब
यहाँ
मैं
समुंदर
के
किनारे
आ
गया
ख़ुद-कुशी
शायद
'ललित'
हो
अब
यहाँ
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बात
को
दिल
में
दबाए
रखता
हूँ
ऐसे
मैं
ख़ुद
को
सताए
रखता
हूँ
सब्ज़
क्यूँ
करते
हो
ज़ख़्मों
को
मेरे
जब
उन्हें
मैं
ही
छुपाए
रखता
हूँ
ज़िंदगी
की
कश्ती
यूँँ
चलती
है
अब
राब्ता
ग़म
से
बनाए
रखता
हूँ
क्या
तुम्हें
मालूम
हैं
ख़ुद
को
फ़क़त
उसके
अबरू
से
बचाए
रखता
हूँ
कर
ली
है
फूलों
ने
मुझ
सेे
दूरियाँ
चाँद
को
जबसे
रिझाए
रखता
हूँ
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Lalit Mohan Joshi
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इरादा
है
मुझे
अब
तो
सताने
का
ख़मोशी
जर्फ़
है
अब
क्या
बताने
का
समुंदर
काम
अपना
ही
करे
यारो
बहाकर
बात
को
क्यूँँ
है
जताने
का
उसी
उल्फ़त
से
हम
बेक़ार
हो
रक्खे
हुनर
हमको
भी
आता
है
सताने
का
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Lalit Mohan Joshi
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मुश्क
आने
मौत
की
मुझको
लगी
इश्क़
दुनिया
करने
ही
मुझको
लगी
क्या
कहूँ
मैं
ऐसी
नादानी
को
अब
प्यार
में
फिर
छलने
भी
मुझको
लगी
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Lalit Mohan Joshi
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शोर
अंदर
मेरे
बढ़ता
जा
रहा
है
चेहरे
पे
उसका
ही
ग़म
अब
छा
रहा
है
क्या
कहा
ज़ख़्मी
हो
तुम
तो
वार
से
फिर
फिर
तुम्हें
वो
बे-वफ़ा
क्यूँ
भा
रहा
है
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Lalit Mohan Joshi
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