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Kunu
kahaan ham sukhan ka qamar jaante hain
kahaan ham sukhan ka qamar jaante hain | कहाँ हम सुखन का क़मर जानते हैं
- Kunu
कहाँ
हम
सुखन
का
क़मर
जानते
हैं
मगर
इस
इरम
का
असर
जानते
हैं
हुआ
इक
कहानी
तमाशा
क़ज़ा
जब
ख़फ़ा
सब
गुलिस्ताँ
ख़बर
जानते
हैं
- Kunu
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और
कुछ
राद
सुना
वहशत
में
बन
गया
दर्द
क़ज़ा
वहशत
में
सब
जुनूँ
बूद
सक़ाफ़त
तक
ही
कुछ
नहीं
नाज़
वफ़ा
वहशत
में
ना-रसा
आब
लबों
का
तेरे
बे-मज़ा
रात
किता
वहशत
में
आरज़ू
बाब
मिरे
पैरामन
बारहा
यार
फ़ना
वहशत
में
पेशतर
राह
बना
क़ातिल
तक
और
फिर
वार
हुआ
वहशत
में
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Kunu
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नारसा
मर्द
फ़ज़ा
तक
क़ाबिल
बारहा
रात
कटा
पत्थर
में
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गुफ़्तगू
और
नहीं
वहमन
से
सब
वफ़ा
पीर
दवा
परवर
में
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कुछ
नहीं
अब
यहाँ
बचा
मेरा
नीम-जाँ
तक
ज़बूँ
अदा
मेरा
और
भी
थे
क़दम
गदाई
के
यार
वो
खा
गया
क़ज़ा
मेरा
ज़िन्दगानी
रफ़ू
हुई
ऐसे
गुफ़्तगू
भी
ज़ियाँ
नुमा
मेरा
चार
अहल-ए-सुख़न
मुक़र्रर
थे
तब
कहीं
पर
अयाँ
ख़ता
मेरा
वो
चली
थी
हवा
कहीं
से
तो
राहज़न
यूँँ
कहाँ
वफ़ा
मेरा
बे-मज़ा
लब
पिए
नहीं
कामिल
था
उसी
दर्द
का
नशा
मेरा
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Kunu
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यार
इक
दु'आ
यूँँ
बहाल
हो
राह
में
उसे
भी
मलाल
हो
वो
करे
दवा
शहर
शहर
में
और
नाज़
उसका
जमाल
हो
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