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Kunu
aish hai auj hai mehfil ab
aish hai auj hai mehfil ab | ऐश है औज है महफ़िल अब
- Kunu
ऐश
है
औज
है
महफ़िल
अब
बिक
रहा
रास्त
यहाँ
सर
सर
में
- Kunu
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नाज़
है
यूँँ
अजीब
कहलाऊॅं
यार
अपना
रक़ीब
कहलाऊॅं
थूक
दूँ
कुछ
यहाँ
वहाँ
वहशत
और
मैं
भी
अदीब
कहलाऊॅं
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Kunu
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और
कुछ
राद
सुना
वहशत
में
बन
गया
दर्द
क़ज़ा
वहशत
में
सब
जुनूँ
बूद
सक़ाफ़त
तक
ही
कुछ
नहीं
नाज़
वफ़ा
वहशत
में
ना-रसा
आब
लबों
का
तेरे
बे-मज़ा
रात
किता
वहशत
में
आरज़ू
बाब
मिरे
पैरामन
बारहा
यार
फ़ना
वहशत
में
पेशतर
राह
बना
क़ातिल
तक
और
फिर
वार
हुआ
वहशत
में
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सब
जुनूँ
बूद
सक़ाफ़त
तक
ही
कुछ
नहीं
नाज़
वफ़ा
वहशत
में
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तैरना
भूल
गया
सागर
में
नीमजाँ
नाज़
हुआ
बिस्तर
में
नारसा
मर्द
फ़ज़ा
तक
क़ाबिल
बारहा
रात
कटा
पत्थर
में
गुफ़्तगू
और
नहीं
वहमन
से
सब
वफ़ा
पीर
दवा
परवर
में
हम
यहीं
दूद
क़ज़ा
पे
ग़ाफ़िल
और
सब
होंगे
कता
अख्तर
में
ऐश
है
औज
है
महफ़िल
अब
बिक
रहा
रास्त
यहाँ
सर
सर
में
बे-कफ़न
लाश
रहा
हूॅं
कुनू
थूके
है
ख़ून
निता
ख़ंजर
में
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बन
गई
आबरू
वफ़ा
कामिल
कुछ
नहीं
हो
सका
ख़ुदा
कामिल
इल्तिजा
थी
किताब-रू
दुनिया
पर
मिली
बेमज़ा
बला
कामिल
और
भी
है
यहाँ
सुखन
ज़िंदा
मत
कहो
दरमियाँ
दवा
कामिल
पेशतर
हम-ज़बाँ
हुई
वहशत
फिर
खिली
नस्तरन
नुमा
कामिल
नीम-जाँ
तक
छुटा
नहीं
दामन
वो
रही
गुल-बदन
क़ज़ा
कामिल
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Kunu
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