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Kunu
Ban gai aabru vafa kaamil
बन गई आबरू वफ़ा कामिल
- Kunu
बन
गई
आबरू
वफ़ा
कामिल
कुछ
नहीं
हो
सका
ख़ुदा
कामिल
इल्तिजा
थी
किताब-रू
दुनिया
पर
मिली
बेमज़ा
बला
कामिल
और
भी
है
यहाँ
सुखन
ज़िंदा
मत
कहो
दरमियाँ
दवा
कामिल
पेशतर
हम-ज़बाँ
हुई
वहशत
फिर
खिली
नस्तरन
नुमा
कामिल
नीम-जाँ
तक
छुटा
नहीं
दामन
वो
रही
गुल-बदन
क़ज़ा
कामिल
- Kunu
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तैरना
भूल
गया
सागर
में
नीमजाँ
नाज़
हुआ
बिस्तर
में
नारसा
मर्द
फ़ज़ा
तक
क़ाबिल
बारहा
रात
कटा
पत्थर
में
गुफ़्तगू
और
नहीं
वहमन
से
सब
वफ़ा
पीर
दवा
परवर
में
हम
यहीं
दूद
क़ज़ा
पे
ग़ाफ़िल
और
सब
होंगे
कता
अख्तर
में
ऐश
है
औज
है
महफ़िल
अब
बिक
रहा
रास्त
यहाँ
सर
सर
में
बे-कफ़न
लाश
रहा
हूॅं
कुनू
थूके
है
ख़ून
निता
ख़ंजर
में
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दर्द
भी
गुल
बदन
हुआ
उस
पे
इस
क़दर
है
निहाल
इक
लड़की
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बाद
तेरे
नहीं
खो
सका
रात
में
और
ये
बूद
पैदा
नहीं
गात
में
हो
चुकी
इल्तिजा
फ़र्ज़
सब
नाज
से
फिर
भी
ये
नाज़ुकी
ना-रसा
बात
में
मैं
कहीं
मर
चुका
बारहा
रास
पे
मत
रहो
हर
दफ़ा
इस
दवा
जात
में
पुरशिकन
अंजुमन
ख़ानमाँ
दूद
सब
जी
गया
यार
एक
आरज़ू
मात
में
हो
रहा
राज़दाँ
नारसाई
कुनू
जान
पड़ती
क़ज़ा
अब
यही
सात
में
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ये
न
था
कि
हसीं
नहीं
थे
हम
बारहा
बस
हमीं
नहीं
थे
हम
ज़िन्दगानी
हुई
अदा
ऐसे
पीठ-पीछे
यक़ीं
नहीं
थे
हम
मुफ़्लिसी
सब
उड़ा
गई
मंज़िल
यार
हासिल
कहीं
नहीं
थे
हम
इक
क़ज़ा
भी
अता
नहीं
मुझ
पे
किस-क़दर
मह-जबीं
नहीं
थे
हम
नाज
कह
कर
हुआ
सही
कामिल
मर्द
भी
जा-नशीं
नहीं
थे
हम
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नीमजाँ
तक
छुटा
नहीं
दामन
वो
रही
गुल-बदन
क़ज़ा
कामिल
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