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Kunu
Naaz hai yun azeeb kahlaun
नाज़ है यूँँ अजीब कहलाऊॅं
- Kunu
नाज़
है
यूँँ
अजीब
कहलाऊॅं
यार
अपना
रक़ीब
कहलाऊॅं
थूक
दूँ
कुछ
यहाँ
वहाँ
वहशत
और
मैं
भी
अदीब
कहलाऊॅं
बारहा
रास्त
लिख
रहा
जो
यूँँ
इल्तिजा
है
सलीब
कहलाऊॅं
शुक्रिया
मत
कहो
मुझे
साहिब
आरज़ू
है
तबीब
कहलाऊॅं
लिख
रहा
नज्म़
रूह
पे
कामिल
ख़्वाब
है
इक
नजीब
कहलाऊँ
- Kunu
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तैरना
भूल
गया
सागर
में
नीमजाँ
नाज़
हुआ
बिस्तर
में
नारसा
मर्द
फ़ज़ा
तक
क़ाबिल
बारहा
रात
कटा
पत्थर
में
गुफ़्तगू
और
नहीं
वहमन
से
सब
वफ़ा
पीर
दवा
परवर
में
हम
यहीं
दूद
क़ज़ा
पे
ग़ाफ़िल
और
सब
होंगे
कता
अख्तर
में
ऐश
है
औज
है
महफ़िल
अब
बिक
रहा
रास्त
यहाँ
सर
सर
में
बे-कफ़न
लाश
रहा
हूॅं
कुनू
थूके
है
ख़ून
निता
ख़ंजर
में
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Kunu
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नाज़
से
है
जमाल
इक
लड़की
कर
रही
दिन
मुहाल
इक
लड़की
बन
गई
आज
से
दु'आ
सी
वो
छू
गई
हर
ख़याल
इक
लड़की
ले
गई
दिल
निगाह
में
रख
कर
हाँ
अदास
कमाल
इक
लड़की
दर्द
भी
गुल-बदन
हुआ
उस
पे
इस
क़दर
थी
निहाल
इक
लड़की
क्या
बताऊँ
'कुनू'
मुहब्बत
में
हर
तरफ़
है
मिसाल
इक
लड़की
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ऐश
है
औज
है
महफ़िल
अब
बिक
रहा
रास्त
यहाँ
सर
सर
में
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इस
सलीक़े
से
अब
बताते
हैं
दर्द
में
ख़ूब
मुस्कुराते
हैं
वो
समझते
रहे
बला
जिस
को
उस
पे
हम
रौशनी
उगाते
हैं
चढ़
गया
आजकल
नशा
कितना
लोग
लड़
कर
ख़ुदा
बचाते
हैं
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सब
जुनूँ
बूद
सक़ाफ़त
तक
ही
कुछ
नहीं
नाज़
वफ़ा
वहशत
में
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