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Rohan Hamirpuriya
iqaar kar ke har dafa inkaar karta hai
iqaar kar ke har dafa inkaar karta hai | इक़रार कर के हर दफ़ा इंकार करता है
- Rohan Hamirpuriya
इक़रार
कर
के
हर
दफ़ा
इंकार
करता
है
है
इल्तिजा
मेरी
कि
हुनर
ये
सिखा
मुझे
- Rohan Hamirpuriya
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कहाँ
हम
ग़ज़ल
का
हुनर
जानते
हैं
मगर
इस
ज़बाँ
का
असर
जानते
हैं
ये
वो
हुस्न
जिसको
निखारा
गया
है
नया
कुछ
नहीं
हम
ख़बर
जानते
हैं
कि
है
जो
क़फ़स
में
वो
पंछी
रिहा
हो
परिंदें
ज़मीं
के
शजर
जानते
हैं
फ़क़त
रूह
के
नाम
है
इश्क़
लेकिन
बदन
के
हवाले
से
घर
जानते
हैं
फ़ुलाँ
है
फ़ुलाँ
का
यक़ीं
हैं
हमें
भी
सुनो
हम
उसे
सर-ब-सर
जानते
हैं
कि
अब
यूँँ
सिखाओ
न
रस्म-ए-सियासत
झुकाना
कहाँ
है
ये
सर
जानते
हैं
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Neeraj Neer
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उम्र
जो
बे-ख़ुदी
में
गुज़री
है
बस
वही
आगही
में
गुज़री
है
Gulzar Dehlvi
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अब
तो
उस
सूने
माथे
पर
कोरेपन
की
चादर
है
अम्मा
जी
की
सारी
सजधज,
सब
ज़ेवर
थे
बाबूजी
कभी
बड़ा
सा
हाथ
ख़र्च
थे
कभी
हथेली
की
सूजन
मेरे
मन
का
आधा
साहस,
आधा
डर
थे
बाबूजी
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Aalok Shrivastav
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हम
ने
क़ुबूल
कर
लिया
अपना
हर
एक
जुर्म
अब
आप
भी
तो
अपनी
अना
छोड़
दीजिए
Harsh saxena
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बा-हुनर
होके
कुछ
न
कर
पाना
रेज़ा-रेज़ा
बिखर
के
ढेह
जाना
मुझको
बेहद
उदास
करता
है
ख़ास
लोगों
का
आम
रह
जाना
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Vishal Bagh
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बेवफ़ाई
ने
तिरी
मुझको
दिया
है
ये
हुनर
बस
यार
दुनिया
में
कहाँ
हर
भाग्य
में
ये
फ़न
लिखा
है
Harsh saxena
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ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
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उसने
पूछा
था
पहले
हाल
मेरा
फिर
किया
देर
तक
मलाल
मेरा
मैं
वफ़ा
को
हुनर
समझता
था
मुझपे
भारी
पड़ा
कमाल
मेरा
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Subhan Asad
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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अना
को
अपनी
समझाना
पड़ेगा
बुलाती
है,
तो
फिर
जाना
पड़ेगा
Salman Zafar
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ग़नीमत
कि
मय-ख़ाने
में
जाम
बाक़ी
तिरे
से
मोहब्बत
सर-ए-आम
बाक़ी
न
तरक़ीब
कोई
कि
भूलें
तुझे
अब
मिरे
होंट
पर
इक
तिरा
नाम
बाक़ी
रज़ा
है
तिरी
भी
अगर
तो
बता
दे
मोहब्बत
में
इक़रार
के
काम
बाक़ी
सर-ए-राह
दिल
की
लगी
है
नुमाइश
मोहब्बत
निभाने
के
अंजाम
बाक़ी
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Rohan Hamirpuriya
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याद
न
करने
के
बहाने
हो
गए
याद
किए
उसको
ज़माने
हो
गए
उस
को
भी
बाक़ी
न
रहा
कोई
गिला
अपने
भी
अब
ज़ख़्म
पुराने
हो
गए
कर
लीं
निगाहें
निची
जो
मुस्कुरा
कर
बज़्म
में
सब
तेरे
दिवाने
हो
गए
हो
के
जुदा
उन
सेे
ये
मालूम
हुआ
शहर
में
कम
अपने
ठिकाने
हो
गए
वा'दा
निभाने
का
जुनूँ
था
तो
मगर
क़िस्से
वो
अब
महज़
फ़साने
हो
गए
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Rohan Hamirpuriya
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याद
नहीं
आती
है
उसको
मेरी
अब
मगर
देखे
हैं
पत्थर
के
दिल
मैंने
पिघलते
हुए
Rohan Hamirpuriya
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नई
है
मुहब्बत
नया
है
जुनूँ
है
उसको
झिझक
साथ
चलते
हुए
Rohan Hamirpuriya
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उन
से
मुझे
वफ़ा
की
दरकार
ही
रही
उन
से
मेरी
हमेशा
तकरार
ही
रही
झगड़ा
हुआ
गिरेबाँ
पकड़ा
दुखाया
दिल
इक
अरसे
से
हमारी
यलगार
ही
रही
हाकिम
के
फ़ैसले
से
नाशाद
हूँ
मगर
गर्दन
पे
मेरी
हावी
तलवार
ही
रही
हम
समझे
थे
है
उल्फ़त
इक
चीज़
काम
की
अपने
लिए
मगर
ये
बेकार
ही
रही
बनता
गया
सियासी
मुद्दा
ये
इश्क़
भी
हावी
हमेशा
उनकी
सरकार
ही
रही
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Rohan Hamirpuriya
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