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Rohan Hamirpuriya
Uth ke tere qareeb baith gya
उठ के तेरे क़रीब बैठ गया
- Rohan Hamirpuriya
उठ
के
तेरे
क़रीब
बैठ
गया
मेरे
होते
रक़ीब
बैठ
गया
ग़म-गुसारी
से
उठ
खड़ा
हुआ
मैं
हाल
सुन
के
तबीब
बैठ
गया
ताज
दौलत
हुनर
मक़ाम
मिला
इश्क़
में
पर
नसीब
बैठ
गया
शख़्स
जिस
से
गिला
था
अरसे
से
मुस्कुरा
कर
क़रीब
बैठ
गया
इक
नज़र
देखा
मैंने
उस
को
और
तख़्त-ए-दिल
पर
हबीब
बैठ
गया
जब
सियासत
ने
अपना
रुख़
बदला
ज़हर
ख़ा
कर
ग़रीब
बैठ
गया
- Rohan Hamirpuriya
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शौक़
है
अभी
तुझे
ग़ैर
से
निभाने
का
फिर
भी
अपनी
हम
वफ़ा
तेरे
नाम
करते
हैं
Rohan Hamirpuriya
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हम
से
कहती
रहती
है
शादी
का
और
'आशिक़
ग़ैरों
को
बताती
है
दफ़्तर
से
वापिस
जल्दी
आता
हूँ
बिन
मेरे
माँ
खाना
न
खाती
है
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Rohan Hamirpuriya
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इस
में
मुनाफ़ा
हर
दम
है
ऐसा
ख़सारा
है
दोस्ती
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Rohan Hamirpuriya
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दो-चार
रोज़
तो
हमें
अच्छा
लगा
मगर
खा
कर
फ़रेब
अक़्ल
ठिकाने
पे
आ
गई
Rohan Hamirpuriya
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तुम
हरी
चूड़ी
न
देते
शादी
की
गोली
न
देते
बद-सुलूकी
सब
भली
पर
चाय
तो
ठंडी
न
देते
फूल
गर
बस
में
नहीं
थे
कम
से
कम
डाली
न
देते
कहना
था
तो
मुझ
को
कहते
बच्चों
को
गाली
न
देते
देर
से
आया
था
लेकिन
ग़ैर
की
थाली
न
देते
जब
मुहब्बत
ही
नहीं
थी
ज़ाफ़राँ
साड़ी
न
देते
पैसे
ही
लेने
थे
तो
फिर
प्यासे
को
पानी
न
देते
पैसा-ज़ेवर
माँगा
था
तो
वहशी
को
लड़की
न
देते
ज़िंदा
था
उम्मीद
पे
तो
प्यासे
को
पानी
न
देते
बेअसर
हर
बात
'रोहन'
लफ़्ज़ों
को
मानी
न
देते
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Rohan Hamirpuriya
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