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Rohan Hamirpuriya
tamasha ik naya kar baitha hooñ
tamasha ik naya kar baitha hooñ | तमाशा इक नया कर बैठा हूँ
- Rohan Hamirpuriya
तमाशा
इक
नया
कर
बैठा
हूँ
जला
कर
शहर
को
घर
बैठा
हूँ
बुला
कर
माँ
को
घर
से
शहर
में
सवेरे
से
मैं
दफ़्तर
बैठा
हूँ
मिला
करते
थे
हम
जिस
इक
जगह
उसी
टपरी
पे
अक्सर
बैठा
हूँ
विलायत
से
पढ़े
यारों
के
बीच
मैं
ही
तो
सब
सेे
बदतर
बैठा
हूँ
तेरी
तो
शादी
है
और
इक
मैं
हूँ
तेरी
महफ़िल
में
हँस
कर
बैठा
हूँ
- Rohan Hamirpuriya
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पूछिए
न
बच्चे
से
दूर
क्यूँ
है
बस्ते
से
रिश्ते
टूट
जाते
हैं
रोज़-रोज़
झगडे
से
आख़िरी
दफ़ा
मिल
कर
मिल
ले
मुझ
से
अच्छे
से
हो
गया
हूँ
बे-तरतीब
तेरे
हाँ
न
करने
से
जिस्म
गर
नहीं
हासिल
खेल
ले
खिलौने
से
कर्बला
को
आता
देख
हट
गया
मैं
रस्ते
से
याद
करना
है
बचपन
ला
किताब
बस्ते
से
थोड़ी
भी
हो
गुंजाइश
लौट
आना
रस्ते
से
हाँ
है
रिश्ता
नाजाइज़
कौन
डरता
मरने
से
तुझ
से
मिलने
से
पहले
दूर
था
मैं
मरने
से
उन
की
यारी
कच्ची
थी
दोस्त
थे
जो
पक्के
से
टल
गई
है
बर्बादी
तेरे
हाँ
न
करने
से
बाद
इतनी
मुद्दत
के
हैं
उसी
पे
अटके
से
उस
से
अपना
झगड़ा
है
और
वो
भी
अरसे
से
लगते
कान
पे
झुमके
दो
सितारे
लटके
से
ये
दिवाल
'रोहन'
ने
पक्की
की
है
कच्चे
से
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भूला
नहीं
हूँ
माज़ी
का
अफ़साना
गुज़रा
कल
ही
है
फ़िलहाल
मेरा
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झेले
हैं
जिसकी
ख़ातिर
मुहब्बत
में
हमने
अज़ाब
कहता
फिरता
है
सब
सेे
मुहब्बत
में
क्या
रक्खा
है
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तुम
बोलो
क्या
कर
के
दोगे
कुछ
लोगों
ने
ताज
बनाया
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उस
के
कूचे
से
जब
भी
गुज़रते
हैं
ज़ेहन
में
बादल
ग़म
के
उभरते
हैं
काम
न
आती
है
बंदगी
कोई
आशिक़
जब
वादे
से
मुकरते
हैं
उस
के
हुस्न
का
कहना
ही
क्या
यारों
बिखरता
हूँ
मैं
जब
वो
सँवरते
हैं
इन
ख़्वाबों
को
सहेज
तो
लूँ
मगर
टूटे
इक
तो
बाक़ी
बिखरते
हैं
शा'इरी
वो
फ़न
है
यारों
जिस
से
आशिक़ी
के
अंदाज़
निखरते
हैं
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