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Rohan Hamirpuriya
gilaa ye ki ab mahz sadmaat baaki
gilaa ye ki ab mahz sadmaat baaki | गिला ये कि अब महज़ सदमात बाक़ी
- Rohan Hamirpuriya
गिला
ये
कि
अब
महज़
सदमात
बाक़ी
रही
है
यही
अब
तो
सौग़ात
बाक़ी
कई
मर्तबा
बोल
दी
बात
दिल
की
बताने
को
फिर
इक
मगर
बात
बाक़ी
सवेरे
मुलाक़ात
की
राह
देखूँ
बढ़े
बेक़रारी
मगर
रात
बाक़ी
न
मंज़िल
नज़र
में
न
रुकने
की
चाहत
मिरी
जान
लंबा
अभी
साथ
बाक़ी
वफ़ा
का
छिड़ा
ज़िक्र
तो
कह
चले
यूँँ
कि
मसलन
अभी
इश्क़
की
मात
बाक़ी
- Rohan Hamirpuriya
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तुम्हें
ज़रूर
कोई
चाहतों
से
देखेगा
मगर
वो
आँखें
हमारी
कहाँ
से
लाएगा
तुम्हारे
साथ
ये
मौसम
फ़रिश्तों
जैसा
है
तुम्हारे
बा'द
ये
मौसम
बहुत
सताएगा
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Bashir Badr
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मैं
नज़र
से
पी
रहा
था
तो
ये
दिल
ने
बद-दुआ
दी
तिरा
हाथ
ज़िंदगी
भर
कभी
जाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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भीगीं
पलकें
देख
कर
तू
क्यूँँ
रुका
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
तो
मेरी
आँख
में
कुछ
आ
गया
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
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Zubair Ali Tabish
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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आँख
भर
आई
किसी
से
जो
मुलाक़ात
हुई
ख़ुश्क
मौसम
था
मगर
टूट
के
बरसात
हुई
Manzar Bhopali
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माँ
जैसे
देखती
हो
तुम
मगर
मैं
तुम्हारी
आँख
का
तारा
नहीं
हूँ
Divy Kamaldhwaj
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क्यूँँ
इक
तरफ़
निगाह
जमाए
हुए
हो
तुम
क्या
राज़
है
जो
मुझ
से
छुपाए
हुए
हो
तुम
Shakeel Badayuni
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नज़र
में
रखना
कहीं
कोई
ग़म
शनास
गाहक
मुझे
सुख़न
बेचना
है
ख़र्चा
निकालना
है
Umair Najmi
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सब
बाहों
में
झूल
चुकी
है
वो
तुझ
को
कब
का
भूल
चुकी
है
वो
Rohan Hamirpuriya
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तजरबा
है
तो
पता
होगा
इश्क़
का
अंजाम
क्या
होगा
फिर
मुहब्बत
उस
सेे
गर
होगी
ज़ख़्म
फिर
कोई
हरा
होगा
है
मुकरने
का
इरादा
गर
देख
लेना
फिर
बुरा
होगा
पहले
से
था
इल्म
ये
सब
को
राब्ता
उस
सेे
सज़ा
होगा
बिन
पिए
हम
जो
बहकते
हैं
उसकी
आँखों
का
नशा
होगा
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Rohan Hamirpuriya
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निभाने
में
कसर
बाक़ी
न
छोड़ी
याद
तो
होगा
मोहब्बत
के
जुनूँ
में
जो
ख़म-ए-गेसू
सँवारे
थे
Rohan Hamirpuriya
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बीस
की
है
वो
बच्ची
नइँ
फिर
भी
इशारा
समझी
नइँ
उस
से
जुदा
हुए
हैं
तो
बज़्म
में
गिनती
होती
नइँ
शहर
बुला
रहा
था
पर
गाँव
की
रेत
छोड़ी
नइँ
कहता
रहा
उतरने
को
हमने
भी
कश्ती
छोड़ी
नइँ
गाँठ
रहेगी
रिश्ते
में
सोच
के
डोर
जोड़ी
नइँ
रोती
रही
वो
रस्ते
भर
बाप
ने
कार
रोकी
नइँ
सारे
जला
दिए
थे
ख़त
याद
की
राख
ढोई
नइँ
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Rohan Hamirpuriya
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थोड़ा
सा
जो
मैं
शातिर
हूँ
सिर्फ़
तुम्हारी
ख़ातिर
हूँ
Rohan Hamirpuriya
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