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Kazim Rizvi
hijr ke din guzaarne vaala
hijr ke din guzaarne vaala | हिज्र के दिन गुज़ारने वाला
- Kazim Rizvi
हिज्र
के
दिन
गुज़ारने
वाला
दिल
खिलाड़ी
है
हारने
वाले
मेरे
दिल
से
उतर
नहीं
पाया
मुझ
को
दिल
से
उतारने
वाला
बद्दुआ
है,
कि
खाक
हो
जाए
तेरी
ज़ुल्फ़ें
संवारने
वाला
मेरे
अल्फ़ाज़
क्यूँ
ना
कड़वे
हों
मैं
हूँ
क़िस्मत
का
हारने
वाला
ख़ुश-गवारी
की
आरज़ू
न
करे
मेरी
ख़ुशियों
को
मारने
वाला
- Kazim Rizvi
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बहाने
और
भी
होते
जो
ज़िंदगी
के
लिए
हम
एक
बार
तिरी
आरज़ू
भी
खो
देते
Majrooh Sultanpuri
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ये
आरज़ू
भी
बड़ी
चीज़
है
मगर
हमदम
विसाल-ए-यार
फ़क़त
आरज़ू
की
बात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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ख़मोशी
मेरी
मअनी-ख़ेज़
थी
ऐ
आरज़ू
कितनी
कि
जिस
ने
जैसा
चाहा
वैसा
अफ़्साना
बना
डाला
Arzoo Lakhnavi
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आरज़ू
वस्ल
की
रखती
है
परेशाँ
क्या
क्या
क्या
बताऊँ
कि
मेरे
दिल
में
है
अरमाँ
क्या
क्या
Akhtar Shirani
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न
जी
भर
के
देखा
न
कुछ
बात
की
बड़ी
आरज़ू
थी
मुलाक़ात
की
Bashir Badr
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इस
क़दर
था
खटमलों
का
चारपाई
में
हुजूम
वस्ल
का
दिल
से
मिरे
अरमान
रुख़्सत
हो
गया
Akbar Allahabadi
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बे-आरज़ू
भी
ख़ुश
हैं
ज़माने
में
बाज़
लोग
याँ
आरज़ू
के
साथ
भी
जीना
हराम
है
Shuja Khawar
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मिरी
आरज़ू
का
हासिल
तिरे
लब
की
मुस्कुराहट
हैं
क़ुबूल
मुझ
को
सब
ग़म
तिरी
इक
ख़ुशी
के
बदले
Kashif Adeeb Makanpuri
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल,
तो
जुस्तजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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मरने
का
है
ख़याल
ना
जीने
की
आरज़ू
बस
है
मुझे
तो
वस्ल
के
मौसम
की
जुस्तजू
Muzammil Raza
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प्याला
ए
अंगबीन
क्यूँ
हो
तुम
इस
क़दर
दिल
नशीन
क्यूँ
हो
तुम
तुम
को
देखूं,
तो
होश
खो
बैठूं
यार
इतने
हसीन
क्यूँ
हो
तुम
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Kazim Rizvi
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ज़बान
काटेंगे
हक़
सुनाने
पे
साहिब-ए-इक़्तेदार,
तो
क्या
लहू
हमारा
बग़ैर
बोले
ज़बाँ
दराज़ी
किया
करेगा
Kazim Rizvi
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ये
दिसंबर
की
फ़िज़ाएँ
अक्सर
दिल
के
शोलों
को
हवा
देती
हैं
जाने
जाँ
आज
भी
ठंडी
रातें
अपने
माज़ी
का
पता
देती
हैं
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Kazim Rizvi
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रोते
रहना
हयात
है
'काज़िम'
रो
न
पाएँ,
तो
घुट
के
मर
जाएँ
Kazim Rizvi
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कोई
मातम
नहीं
करता
उस
का
मौत
से
क़ब्ल
जो
मर
जाता
है
दिल
की
चौखट
पे
सरे
शाम
अक्सर
कोई
आता
है,
गुज़र
जाता
है
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Kazim Rizvi
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