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Aashish kargeti 'Kash'
kuchh na hogaa siwaye rone ke
kuchh na hogaa siwaye rone ke | कुछ न होगा सिवाए रोने के
- Aashish kargeti 'Kash'
कुछ
न
होगा
सिवाए
रोने
के
हादसे
में
चली
गई
है
जान
- Aashish kargeti 'Kash'
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इसी
से
जान
गया
मैं
कि
बख़्त
ढलने
लगे
मैं
थक
के
छाँव
में
बैठा
तो
पेड़
चलने
लगे
मैं
दे
रहा
था
सहारे
तो
इक
हुजूम
में
था
जो
गिर
पड़ा
तो
सभी
रास्ता
बदलने
लगे
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Farhat Abbas Shah
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बोसा
लिया
जो
उस
लब-ए-शीरीं
का
मर
गए
दी
जान
हम
ने
चश्मा-ए-आब-ए-हयात
पर
Ameer Minai
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मैं
होश-मंद
हूँ
ख़ुद
भी
सो
मेरी
ग़ज़लों
में
न
रक़्स
करता
है
'आशिक़
न
बाल
खींचता
है
Charagh Sharma
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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चुरायगा
उसी
से
आँख
क़ातिल
ज़रा
सी
जान
जिस
बिस्मिल
में
होगी
Dagh Dehlvi
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तुम्हें
हुस्न
पर
दस्तरस
है
मोहब्बत
वोहब्बत
बड़ा
जानते
हो
तो
फिर
ये
बताओ
कि
तुम
उस
की
आँखों
के
बारे
में
क्या
जानते
हो
ये
जुग़राफ़िया
फ़ल्सफ़ा
साईकॉलोजी
साइंस
रियाज़ी
वग़ैरा
ये
सब
जानना
भी
अहम
है
मगर
उस
के
घर
का
पता
जानते
हो
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Tehzeeb Hafi
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हल्की-हल्की
सी
हँसी,
साफ
इशारा
भी
नहीं
जान
भी
ले
गए
और,
जान
से
मारा
भी
नहीं
Sawan Shukla
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चाहे
हो
आसमान
पे
चाहे
ज़मीं
पे
हो
वहशत
का
रक़्स
हम
ही
करेंगे
कहीं
पे
हो
दिल
पर
तुम्हारे
नाम
की
तख़्ती
लगी
न
थी
फिर
भी
ज़माना
जान
गया
तुम
यहीं
पे
हो
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Nirmal Nadeem
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तेरा
पीछा
करते
करते
जाने
क्यूँ
मैं
दुनियादारी
से
पीछे
छूट
गया
तूने
तो
ऐ
जान
महज़
दिल
तोड़ा
था
तू
क्या
जाने
मैं
अंदर
तक
टूट
गया
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Ritesh Rajwada
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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गुफ़्तगू
तू
न
अरबदा-जू
कर
जैसा
मैंने
किया
नहीं
तू
कर
लग
रहा
था
कई
खिलेंगे
गुल
हाथ
घबरा
गए
उसे
छू
कर
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Aashish kargeti 'Kash'
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ज़ख़्म
पर
यूँँ
नमक
लगा
कर
तुम
दर्द
को
क्यूँ
मेरे
बढ़ाते
हो
Aashish kargeti 'Kash'
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जंगल
की
आग
बुझा
सकते
हो?
बिन
पानी
के
कर
क्या
सकते
हो?
मैं
इक
टूटा
फैंका
पुतला
हूँ
अपने
घर
ले
कर
जा
सकते
हो?
बस
तुम्हें
ही
तो
है
हक
इतना
तुम
मुझको
हाथ
लगा
सकते
हो
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Aashish kargeti 'Kash'
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इश्क़
ताला
अगर
वफ़ा
चाबी
खोल
ताला
सनम
लगा
चाबी
Aashish kargeti 'Kash'
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दिल
को
यूँँ
समझा
लेता
हूँ
ग़ज़लें
गाने
गा
लेता
हूँ
ऊँचे
सुर
भी
भाते
मुझ
को
धीरे
से
भी
गा
लेता
हूँ
अपने
मन
को
बहलाने
को
सबका
मन
बहला
लेता
हूँ
एक
बुरी
आदत
है
मेरी
मैं
सब
को
अपना
लेता
हूँ
शा'इर
भी
हूँ
'आशिक़
भी
हूँ
हर
झगड़ा
सुलझा
लेता
हूँ
आशिक़
बढ़ते
है
बस्ती
में
जब
उसको
बुलवा
लेता
हूँ
तुम
जो
समझो
मेरा
क्या
है
मैं
उसको
समझा
लेता
हूँ
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Aashish kargeti 'Kash'
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