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Kaif Uddin Khan
guzarte vaqt ke maanind hai jo
guzarte vaqt ke maanind hai jo | गुज़रते वक़्त के मानिंद है जो
- Kaif Uddin Khan
गुज़रते
वक़्त
के
मानिंद
है
जो
मेरी
आँखें
उसी
को
ढूँढती
हैं
- Kaif Uddin Khan
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ज़ख़्म
लगे
हैं
कितने
दिल
पर
याद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
शाद
नहीं
हूँ
मैं
तुमको
नाशाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
उम्र
गए
पे
तेरी
सूरत
और
मिरी
आँखें
टकराईं
उम्र
गए
में
सोची
वो
फ़रियाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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उतर
गया
है
चेहरा
तेरे
जाने
से
लॉक
नहीं
खुलता
है
अब
मोबाइल
का
Tanoj Dadhich
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मैं
खोया
खोया
सा
तेरी
छत
की
जानिब
देख
रहा
हूँ
गीले
कपड़े
सूख
रहे
हैं,
सूखी
आँखें
भीग
रही
हैं
Harman Dinesh
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आज
है
उनको
आना,
मज़ा
आएगा
फिर
जलेगा
ज़माना,
मज़ा
आएगा
तीर
उनकी
नज़र
के
चलेंगे
कई
दिल
बनेगा
निशाना
मज़ा
आएगा
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Bhaskar Shukla
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न
करो
बहस
हार
जाओगी
हुस्न
इतनी
बड़ी
दलील
नहीं
Jaun Elia
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आसमाँ
इतनी
बुलंदी
पे
जो
इतराता
है
भूल
जाता
है
ज़मीं
से
ही
नज़र
आता
है
Waseem Barelvi
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देखने
के
लिए
सारा
आलम
भी
कम
चाहने
के
लिए
एक
चेहरा
बहुत
Asad Badayuni
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तू
जो
हर
रोज़
नए
हुस्न
पे
मर
जाता
है
तू
बताएगा
मुझे
इश्क़
है
क्या
जाने
दे
Ali Zaryoun
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मुक़ाबिल
फ़ासलों
से
ही
मोहब्बत
डूब
जाएगी
सुनोगी
झूठी
बातें
तुम
हक़ीक़त
डूब
जाएगी
चलेगी
तब
तलक
जब
तक
तिरी
परछाईं
देखेगी
तिरा
जब
हुस्न
देखेगी
सियासत
डूब
जाएगी
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Anurag Pandey
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निगाहें
उठाकर
सितमगर
चलाता
है
ख़ंजर
सितमगर
यक़ीनन
हवा-ए-अना
से
कटेंगे
तेरे
पर
सितमगर
ये
दिल
इक
जफ़ा-ए-ख़ला
है
यही
है
तेरा
घर
सितमगर
हमें
आदत-ए-इंतिहा
है
नहीं
है
हमें
डर
सितमगर
हवा
की
हदों
से
उतर
जा
उखड़ते
हैं
शहपर
सितमगर
किसे
आरज़ू-ए-जफ़ा
थी
था
किसको
मुयस्सर
सितमगर
पिला
दे
सितम
का
वो
तिर्याक
गिलासों
में
भर
कर
सितमगर
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Kaif Uddin Khan
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न
उन
लबों
पे
तबस्सुम
न
फूल
शाख़ों
पर
गुज़र
गए
हैं
जो
मौसम
गुज़रने
वाले
थे
Kaif Uddin Khan
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वो
हक़ीक़त
को
किस
तरह
समझे
वहम
ने
जिसकी
परवरिश
की
हो
Kaif Uddin Khan
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सुर्ख़
हीरे
से
कोयला
करके
उसने
छोड़ा
है
क्या
से
क्या
करके
क्यूँँ
न
दुनिया
कफ़स
बना
दें
हम
सब
परिंदों
से
मशवरा
करके
क्या
मिला
है
सिवाए
नाकामी
ज़िंदगी
तुझ
सेे
इल्तिजा
करके
कितने
हिस्सों
में
बँट
गए
हैं
हम
एक
होने
का
फ़ैसला
करके
एक
सूरज
वुजूद
में
लाओ
सब
चराग़ों
को
मुजतमा
करके
अब
वो
कहने
को
आदमी
भी
नहीं
उसने
छोड़ा
जिसे
ख़ुदा
करके
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Kaif Uddin Khan
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हवस
की
सहूलत
हटा
दे
बदन
इश्क़
को
रास्ता
दे
अधूरा
है
वो
शख़्स
लेकिन
जिसे
चाहे
कामिल
बना
दे
नहीं
आ
सकूँगा
निकल
कर
मुझे
मेरे
अंदर
गिरा
दे
तजुर्बे
की
आँधी
से
पहले
चराग़-ए-तवक़्क़ो
बुझा
दे
किताब-ए-हवादिस
में
आदम
हवाला
सहूलत
का
क्या
दे
पयंबर
क़लंदर
नहीं,
बस
हमें
ज़ाल-ए-दुनिया,
ख़ुदा
दे
मरूँगा
इसी
से
मैं
इक
दिन
मुझे
ज़िन्दगी
की
दु'आ
दे
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Kaif Uddin Khan
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