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Kaffir
naam likhoon jo teraa patthar bhi makhmal ho jaa.e
naam likhoon jo teraa patthar bhi makhmal ho jaa.e | नाम लिखूँ जो तेरा पत्थर भी मख़मल हो जाए
- Kaffir
नाम
लिखूँ
जो
तेरा
पत्थर
भी
मख़मल
हो
जाए
चाँद
लिखूँ
तो
सारे
तारे
भी
ओझल
हो
जाए
जाम
कहूँ
तो
आँखें
तेरी
दिखे
ओ
मेरे
काफ़िर
नाम
लूँ
तेरा
महफ़िल
में
तो
यार
ग़ज़ल
हो
जाए
- Kaffir
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बेवजह
ये
ज़िंदगी
ऐसा
तमाशा
कर
रही
है
हम
न
जी
सकते
न
ये
'काफ़िर'
जनाज़ा
कर
रही
है
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तू
ठहरे
तो
चाहूँ
कि
चलता
वक़्त
थम
जाए
मेरा
फिर
गोद
में
सोऊँ
तेरी
तो
ख़ून
जम
जाए
मेरा
ये
मौत
जब
भी
आए
तो
बाँहें
मिले
तेरी
मुझे
मुझको
गले
से
तू
लगाए
और
दम
जाए
मेरा
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ग़लतफ़हमी
तुम्हारी
है
कि
हम
तो
बस
ज़रूरत
तक
पिएँगे
अगर
महफ़िल
में
बैठेंगे
तो
'काफ़िर'
हम
क़यामत
तक
पिएँगे
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इश्क़
इमाम
है
मेरा
क्यूँ
मुरीद
रक्खा
है
क्या
है
तुम
में
ऐसा
जो
सब
ख़रीद
रक्खा
है
है
न
इश्क़
की
चाहत
या
न
ही
ज़रूरत
अब
क्यूँँ
न
जाने
'काफ़िर'
को
यूँँ
वदीद
रक्खा
है
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वैसे
समुंदर
हूँ
मगर
ख़ुद
को
मैं
क़तरा
भी
मेरा
हासिल
नहीं
वो
भी
मेरा
होकर
ज़रा
सा
मेरे
हिस्से
में
कभी
शामिल
नहीं
मैं
गर
कहूँ
ये
रात
बाक़ी
है
ज़रा
सा
ठहर
मेरी
पलकों
पर
काफ़िर
वो
तो
कहता
है
मेरी
ये
नज़र
अब
चाँद
के
क़ाबिल
नहीं
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