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Saurabh Yadav Kaalikhh
ek aur saal guzar gaya
ek aur saal guzar gaya | "एक और साल गुज़र गया"
- Saurabh Yadav Kaalikhh
"एक
और
साल
गुज़र
गया"
एक
और
साल
गुज़र
गया
कोई
हँस
दिया
कोई
रो
लिया
किसी
ने
आँसुओं
से
मुँह
धो
लिया
एक
और
साल
गुज़र
गया
कोई
मंज़िल
तक
गया
कोई
रहगुज़र
में
ठहर
गया
कोई
अपने
घर
गया
कोई
पहुँच
गया
पहाड़
तो
कोई
दूर
समुंदर
गया
एक
और
साल
गुज़र
गया
कोई
ज़िंदगी
से
लड़ता
रहा
कोई
ज़िंदगी
से
थक
गया
कोई
थक
कर
भी
चलता
रहा
और
कोई
मौत
संग
रुक
गया
एक
और
साल
गुज़र
गया
किसी
ने
ज़मीं
से
आसमाँ
देखा
किसी
ने
आसमाँ
से
ज़मीं
कोई
ख़ुशी
ख़ुशी
रहा
कुछ
को
नसीब
हुई
नमी
ज़िंदगी
है
कभी
अच्छा
कभी
बुरा
पहर
गया
एक
और
साल
गुज़र
गया
- Saurabh Yadav Kaalikhh
निगाह-ए-गर्म
क्रिसमस
में
भी
रही
हम
पर
हमारे
हक़
में
दिसम्बर
भी
माह-ए-जून
हुआ
Akbar Allahabadi
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दोस्त
अपना
हक़
अदा
करने
लगे
बेवफ़ाई
हमनवा
करने
लगे
मेरे
घर
से
एक
चिंगारी
उठी
पेड़
पत्ते
सब
हवा
करने
लगे
Read Full
Santosh S Singh
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किसी
बे-वफ़ा
से
बिछड़
के
तू
मुझे
मिल
गया
भी
तो
क्या
हुआ
मेरे
हक़
में
वो
भी
बुरा
हुआ
मेरे
हक़
में
ये
भी
बुरा
हुआ
Mumtaz Naseem
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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किसी
के
तुम
हो
किसी
का
ख़ुदा
है
दुनिया
में
मेरे
नसीब
में
तुम
भी
नहीं
ख़ुदा
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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इस
ज़िन्दगी
में
इतनी
फ़राग़त
किसे
नसीब
इतना
न
याद
आ
कि
तुझे
भूल
जाएँ
हम
Ahmad Faraz
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मिलना
था
इत्तिफ़ाक़
बिछड़ना
नसीब
था
वो
उतनी
दूर
हो
गया
जितना
क़रीब
था
Anjum Rehbar
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हमेशा
इक
दूसरे
के
हक़
में
दु'आ
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
मिलें
या
बिछड़ें
मगर
तुम्हीं
से
वफ़ा
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
Shabeena Adeeb
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तो
डर
रहे
हैं
आप
कहीं
हक़
न
माँग
ले
यानी
कि
सबको
खौफ़
है
औरत
के
नाम
से
Abhishar Geeta Shukla
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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वो
कभी
आकर
मुझे
छूकर
के
जाएँ
देखकर
यूँँ
काम
कब
तक
हम
चलाएँ
Saurabh Yadav Kaalikhh
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थे
बहुत
शाही
से
उसके
शौक़
मैं
क्या
बोलता
जान
को
पिस्ता
खिलाने
में
यहाँ
पिसता
रहा
Saurabh Yadav Kaalikhh
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उम्र
भर
वो
दूसरों
की
ही
बनाता
था
छतें
ऐ
ख़ुदा
मज़दूर
की
दीवार
पक्की
क्यूँँ
नहीं
Saurabh Yadav Kaalikhh
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और
क्या
बर्बाद
होगा
बोल
मेरे
शहर
में
घर
बड़े
हैं
कम
बशर
के
मोल
मेरे
शहर
में
Saurabh Yadav Kaalikhh
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ज़ख़्मी
से
दिन
हैं
आजकल
'कालिख़'
यहाँ
तुम
याद
जाने
इस
क़दर
क्यूँँ
आ
रहे
Saurabh Yadav Kaalikhh
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