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Kaafir
marhala maano vafaa ki aam dikkat
marhala maano vafaa ki aam dikkat | मरहला मानो वफ़ा की आम दिक्कत
- Kaafir
मरहला
मानो
वफ़ा
की
आम
दिक्कत
इश्क़-बाज़ों
का
फ़क़त
अंजाम
दिक्कत
- Kaafir
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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ये
उसकी
मेहरबानी
है
वो
घर
में
ही
सँवरती
है
निकल
आए
जो
महफ़िल
में
तो
क़त्ल-ए-आम
हो
जाए
Ashraf Jahangeer
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मुहब्बत
में
जो
माथा
चूम
कर
वा'दा
किया
उसने
उसे
भी
आम
बातों
का
ही
दर्जा
दे
दिया
उसने
सुधा
के
नाम
पर
विषपान
अब
हम
सेे
नहीं
होगा
सुना
ज्यूँँ
ही
मुहब्बत
से
किनारा
कर
लिया
उसने
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Atul K Rai
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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ख़ुद
जिसे
मेहनत
मशक़्क़त
से
बनाता
हूँ
'जमाल'
छोड़
देता
हूँ
वो
रस्ता
आम
हो
जाने
के
बाद
Jamal Ehsani
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ये
क़त्ल-ए-आम
और
बे-इज़्न
क़त्ल-ए-आम
क्या
कहिए
ये
बिस्मिल
कैसे
बिस्मिल
हैं
जिन्हें
क़ातिल
नहीं
मिलता
वहाँ
कितनों
को
तख़्त
ओ
ताज
का
अरमाँ
है
क्या
कहिए
जहाँ
साइल
को
अक्सर
कासा-ए-साइल
नहीं
मिलता
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Asrar Ul Haq Majaz
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दोस्ती
आम
है
लेकिन
ऐ
दोस्त
दोस्त
मिलता
है
बड़ी
मुश्किल
से
Hafeez Hoshiarpuri
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रंग-ओ-रस
की
हवस
और
बस
मसअला
दस्तरस
और
बस
यूँँ
बुनी
हैं
रगें
जिस्म
की
एक
नस
टस
से
मस
और
बस
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Ammar Iqbal
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तुम
अगर
सीखना
चाहो
मुझे
बतला
देना
आम
सा
फ़न
तो
कोई
है
नहीं
तोहफ़ा
देना
Jawwad Sheikh
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बर्बाद
होते
देख
ख़ुद
को
थक
गया
वक़्फ़ा
करें
कुछ
दिन
परेशानी
सभी
Kaafir
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इश्क़
हसरत
बेख़ुदी
का
ये
क़सीदा
पढ़
चला
मसरूफ़
दिल
आफ़त-रसीदा
Kaafir
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कब
तक
तरब
एजाज़
हो
नग़मात
से
कुछ
बे-दिली
से
भी
हमें
आराम
है
Kaafir
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दिल
बद-चलन
बेज़ार
जो
बद-नाम
है
ये
मयकशी
सब
इश्क़
का
अंजाम
है
Kaafir
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मुंतज़िर
की
बे-क़रारी
लौट
आई
अश्क-बारी
शब-गुज़ारी
लौट
आई
Kaafir
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