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Meem Alif Shaz
tere badan par bhi shafaq aane lagii
tere badan par bhi shafaq aane lagii | तेरे बदन पर भी शफ़क़ आने लगी
- Meem Alif Shaz
तेरे
बदन
पर
भी
शफ़क़
आने
लगी
तू
ही
बता
अब
कौन
चाहेगा
तुझे
- Meem Alif Shaz
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रक़ीबों
की
शरारत
तुम
को
क्या
मालूम
हमारी
हर
मुसीबत
तुम
को
क्या
मालूम
न
देखो
इन
गरीबों
को
हिक़ारत
से
कि
आने
वाली
सूरत
तुम
को
क्या
मालूम
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परिंदों
की
तरह
ही
देखना
है
आसमाँ
मुझ
को
वहीं
से
देखना
है
सारा
का
सारा
जहाँ
मुझ
को
Meem Alif Shaz
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बड़े
भोले
हो
या
शायद
नहीं
हो
जो
कर
बैठे
हो
तुम
उन
पे
भरोसा
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इस
दरिया
को
इतना
तो
समझाने
दे
मेरी
कश्ती
को
भी
किनारे
आने
दे
आज़ादी
से
तुझ
को
मोहब्बत
है
तो
फिर
सारे
परिंदों
को
अपने
घर
जाने
दे
तेरी
आँखों
में
इक
शाम
सुहानी
है
उस
मनज़र
की
इक
तस्वीर
बनाने
दे
मिलता
नहीं
जब
तुझ
को
भी
कोई
इंसाफ़
अपनी
ग़ज़लों
को
आवाज़
उठाने
दे
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Meem Alif Shaz
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मैं
गुनहगार
हूँ
तो
सज़ा
दे
मुझे
वरना
बाहों
में
अपनी
जगह
दे
मुझे
इश्क़
मेरा
तो
आसान
होता
नहीं
भूलजा
वस्ल
को
बस
दु'आ
दे
मुझे
सुब्ह
से
शाम
तक
उलझनें
रहती
हैं
रात
भर
चैन
से
तू
सुला
दे
मुझे
बंद
रक्खी
है
अपनी
ज़बाँ
उम्र
भर
सब्र
का
मेरे
तू
ही
सिला
दे
मुझे
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Meem Alif Shaz
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