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Meem Alif Shaz
kuchh bolo varna kal tum bhi nishaane par honge
kuchh bolo varna kal tum bhi nishaane par honge | कुछ बोलो वरना कल तुम भी निशाने पर होंगे
- Meem Alif Shaz
कुछ
बोलो
वरना
कल
तुम
भी
निशाने
पर
होंगे
तीर
लगेगा
सीने
में
फिर
साँसें
बंद
होगी
- Meem Alif Shaz
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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पुरानी
चाहत
के
ज़ख़्म
अब
तक
भरे
नहीं
हैं
और
एक
लड़की
पड़ी
है
पीछे
बड़े
जतन
से
Ashu Mishra
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जितने
भी
हैं
ज़ख़्म
तुम्हारे
सिल
देगी
होटल
में
खाने
का
आधा
बिल
देगी
सीधे
मुँह
जो
बात
नहीं
करती
है
जो
तुमको
लगता
है
वो
लड़की
दिल
देगी
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Shadab Asghar
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जो
सारे
ज़ख़्म
मेरे
भर
दिया
करता
उसी
के
नाम
का
ख़ंजर
बनाया
है
Parul Singh "Noor"
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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कोई
मेरे
दिल
से
पूछे
तिरे
तीर-ए-नीम-कश
को
ये
ख़लिश
कहाँ
से
होती
जो
जिगर
के
पार
होता
Mirza Ghalib
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गीत
लिक्खे
भी
तो
ऐसे
के
सुनाएँ
न
गए
ज़ख़्म
यूँँ
लफ़्ज़ों
में
उतरे
के
दिखाएँ
न
गए
आज
तक
रक्खे
हैं
पछतावे
की
अलमारी
में
एक
दो
वादे
जो
दोनों
से
निभाएँ
न
गए
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Farhat Abbas Shah
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सहर
की
आस
लगाए
हुए
हैं
वो
कि
जिन्हें
कमान-ए-शब
से
चले
तीर
की
ख़बर
भी
नहीं
Abhishek shukla
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तीर
खाने
की
हवस
है
तो
जिगर
पैदा
कर
सरफ़रोशी
की
तमन्ना
है
तो
सर
पैदा
कर
Ameer Minai
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मैं
तिरी
तलाश
में
निकल
पड़ा
हूँ
अजनबी
ज़िन्दगी
की
शाम
अब
कहाँ
हो
कुछ
पता
नहीं
Meem Alif Shaz
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देखो
हज़ारों
घर
यहाँ
फिर
बह
गए
तूफ़ान
के
ताज़ा
निशाँ
फिर
रह
गए
पानी
ही
पानी
घूमता
है
अब
इधर
टूटे
हुए
ख़्वाबों
के
चहरे
रह
गए
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Meem Alif Shaz
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उस
की
बातों
का
जो
तीर
लगा
है
दिल
में
ऐसा
लगता
है
वो
साँसे
कम
कर
देगा
Meem Alif Shaz
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जिस
तरफ़
देखूँ
नज़र
तू
आए
ऐसा
तुझ
में
क्या
है
चाँद,
तारे,
जुगनू,
नर्गिस
इन
से
अच्छा
तुझ
में
क्या
है
Meem Alif Shaz
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फिर
से
बच्चे
वाला
चेहरा
चाहता
हूँ
उलझनों
से
दूर
रहना
चाहता
हूँ
इश्क़
बच्चों
का
तमाशा
हो
गया
है
पहले
वाला
दौर
लाना
चाहता
हूँ
दुनिया
मेरे
जिस्म
में
चुभने
लगी
है
सजदों
से
इसको
हटाना
चाहता
हूँ
अब
कोई
आवाज़
भी
देता
नहीं
शाज़
क़ब्र
से
बाहर
निकलना
चाहता
हूँ
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Meem Alif Shaz
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