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Meem Alif Shaz
badi dilchasp hai meri ghazal jo
badi dilchasp hai meri ghazal jo | बड़ी दिलचस्प है मेरी ग़ज़ल जो
- Meem Alif Shaz
बड़ी
दिलचस्प
है
मेरी
ग़ज़ल
जो
तिरी
मासूमियत
को
बोलती
है
- Meem Alif Shaz
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नया
लिबास
भी
पहनो
तो
इस
तरह
पहनो
जिन्हें
नसीब
नहीं
है
उन्हें
नया
न
लगे
Javed Saba
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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मिलना
था
इत्तिफ़ाक़
बिछड़ना
नसीब
था
वो
उतनी
दूर
हो
गया
जितना
क़रीब
था
Anjum Rehbar
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किसी
बे-वफ़ा
से
बिछड़
के
तू
मुझे
मिल
गया
भी
तो
क्या
हुआ
मेरे
हक़
में
वो
भी
बुरा
हुआ
मेरे
हक़
में
ये
भी
बुरा
हुआ
Mumtaz Naseem
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आप
कहते
थे
कि
रोने
से
न
बदलेंगे
नसीब
उम्र
भर
आप
की
इस
बात
ने
रोने
न
दिया
Sudarshan Fakir
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इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
Vashu Pandey
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टक
गोर-ए-ग़रीबाँ
की
कर
सैर
कि
दुनिया
में
उन
ज़ुल्म-रसीदों
पर
क्या
क्या
न
हुआ
होगा
Meer Taqi Meer
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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जुदा
किसी
से
किसी
का
ग़रज़
हबीब
न
हो
ये
दाग़
वो
है
कि
दुश्मन
को
भी
नसीब
न
हो
Nazeer Akbarabadi
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चाँद
फूल
ख़ुशबू
हुस्न
में
मज़ा
तो
है
मगर
बंदगी
से
अच्छा
कुछ
भी
काएनात
में
नहीं
Meem Alif Shaz
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वो
मुझ
को
करती
है
छत
से
इशारे
उस
का
सच्चा
इश्क़
अभी
बचकाना
है
Meem Alif Shaz
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मिरे
हाथों
में
चाहे
आसमाँ
रख
दो
मिरे
लफ़्ज़ों
में
तबदीली
नहीं
होगी
Meem Alif Shaz
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अपनी
नज़रें
तो
उठा
कर
देखो
इश्क़
में
ख़ुद
को
जला
कर
देखो
Meem Alif Shaz
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सुहूलत
चाहिए
जिनको
मोहब्बत
में
परिंदों
से
मोहब्बत
कर
लें
वो
लड़के
Meem Alif Shaz
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