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Jagveer Singh
mere bas men hota kisi se jo milnaa
mere bas men hota kisi se jo milnaa | मेरे बस में होता किसी से जो मिलना
- Jagveer Singh
मेरे
बस
में
होता
किसी
से
जो
मिलना
तो
रोटी
की
सूरत
में
मुफ़लिस
को
मिलता
- Jagveer Singh
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लो
चाँद
हो
गया
नमू
माह-ए-ख़राम
का
ऐ
मोमिनों
लिबास-ए-सियाह
ज़ेब-ए-तन
करो
फ़र्श-ए-अज़ा
बिछा
के
अज़ाख़ाने
में
शजर
अब
सुब्ह-ओ-शाम
ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन
करो
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Shajar Abbas
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सज़ा
कितनी
बड़ी
है
गाँव
से
बाहर
निकलने
की
मैं
मिट्टी
गूँधता
था
अब
डबलरोटी
बनाता
हूँ
Munawwar Rana
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सुनहरी
लड़कियों
इनको
मिलो
मिलो
न
मिलो
ग़रीब
होते
हैं
बस
ख़्वाब
देखने
के
लिए
Abbas Tabish
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तुझे
न
आएँगी
मुफ़्लिस
की
मुश्किलात
समझ
मैं
छोटे
लोगों
के
घर
का
बड़ा
हूॅं
बात
समझ
Umair Najmi
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उसको
राँझा
मत
कहो,
जो
ना
हुआ
फ़क़ीर
जो
ना
जोगन
हो
सकी,
सो
काहे
की
हीर!
Harman Dinesh
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न
तीर्थ
जा
कर
न
धर्म
ग्रंथो
का
सार
पा
कर
सुकूँ
मिला
है
मुझे
तो
बस
तेरा
प्यार
पा
कर
ग़रीब
बच्चे
किताब
पढ़
कर
सँवर
रहे
हैं
अमीर
लड़के
बिगड़
रहे
हैं
दुलार
पा
कर
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Alankrat Srivastava
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ग़रीब
लोग
कहाँ
ख़ुद
को
बचा
पाएँगे
वबास
बच
भी
गए
भूख
से
मर
जाएँगे
Astitwa Ankur
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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पढ़ने
के
बाद
इक
मरतबा
फिर
पढ़ो
फ़लसफ़े
जानने
हैं
तो
साहिर
पढ़ो
जाना
हम
हैं
बुरे
सो
पढ़ा
हमने
जौन
तुम
तो
अच्छी
हो
परवीन
शाकिर
पढ़ो
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Jagveer Singh
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मेरी
डीपी
भले
चूम
ले
पर
तू
कभी
बात
भी
कर
लिया
कर
नाम
पूछा
किसी
ने
तिरा
जो
चीख़
कर
बोला
मैंने
सितमगर
पहले
नंबर
पे
तू
है
तिरे
बाद
आता
है
कोई
एडोल्फ़
हिटलर
इतना
भाया
मिरा
दुख
सभी
को
बोले
सुनकर
मुकर्रर
मुकर्रर
तेरी
बातें
है
प्यारी
तभी
तक
जब
तलक
तू
न
बोले
मगर
पर
पेट
ख़ाली
रहा
तो
ये
जाना
हिज्र
से
भारी
है
भूक
का
क़हर
हाए
ये
दुख
है
कितना
बड़ा
दुख
तन्हा
बिस्तर
मैं
और
ये
दिसंबर
प्यार
में
सीख
जीना
यूँँ
'जगवीर'
प्यार
पे
मर
न
तू
प्यार
में
मर
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Jagveer Singh
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केक
पे
लिखवाया
यारों
ने
तेरा
नाम
काँपते
हाथों
से
हमने
केक
काटा
ज़िंदगी
के
खुल
गए
थे
दोनों
ही
कान
वक़्त
ने
इक
रोज़
मारा
ऐसा
चाटा
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Jagveer Singh
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जो
मुद्दे
उलझे
सरकारों
से
वो
तय
होने
फिर
तलवारों
से
कुछ
लोगों
से
यूँँ
रिश्ता
मेरा
जैसे
छत
का
है
दीवारों
से
कल
मरने
वाला
तो
आज
मरे
मुर्दा
बेहतर
है
बीमारों
से
ये
ख़ूबी
है
जनता
राज
में
इक
जनता
लड़
जाती
दरबारों
से
दारू
बदले
चुनने
वालो
के
हालात
हो
गए
लाचारों
से
क़ुव्वत
क्या
है
मेरे
दुश्मन
की
मुझको
ख़तरा
है
गद्दारों
से
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Jagveer Singh
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एक
नेता
ने
वफ़ादारी
दिखाई
पर
तवायफ़
कोठा
कैसे
छोड़
पाई
दोस्त
मेरा
हिज्र
पूरा
हो
गया
है
शा'इरी
अब
और
नहीं
करनी
है
भाई
दिल
में
चुभती
है
वो
बातें
मेरे
अक्सर
जो
ज़बाँ
तक
आई
पर
फिर
से
दबाई
एक
दिन
में
मैं
ने
दो
दुख
झेले
हैं
दोस्त
शादी
की
ही
सुब्ह
थी
उसकी
सगाई
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Jagveer Singh
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