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jaani Aggarwal taak
fasaane se haqeeqat ban chuki ho
fasaane se haqeeqat ban chuki ho | फ़साने से हक़ीक़त बन चुकी हो
- jaani Aggarwal taak
फ़साने
से
हक़ीक़त
बन
चुकी
हो
बला
की
ख़ूब-सूरत
बन
चुकी
हो
मुझे
इस
बात
का
अफ़सोस
भी
है
किसी
के
घर
की
इज़्ज़त
बन
चुकी
हो
तुम्हारे
वास्ते
सब
लड़
रहे
हैं
कि
जैसे
तुम
सियासत
बन
चुकी
हो
अजल
तक
बे-करारी
ही
रहेगी
न
जाने
कैसी
आदत
बन
चुकी
हो
कहीं
सुनवाई
जिसकी
हो
न
पाई
तुम
ऐसी
इक
शिकायत
बन
चुकी
हो
जिया
जाता
नहीं
मरना
भी
मुश्किल
मिरे
ख़ातिर
तो
आफ़त
बन
चुकी
हो
- jaani Aggarwal taak
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नाज़-ओ-नख़रे
क्या
उठाए,
क्या
सुने
उस
के
गिले
देखते
ही
देखते
लड़की
घमंडी
हो
गई
देखते
रहने
में
उस
को
और
क्या
होता,
मगर
जो
थी
जान-ए-आरज़ू,
वो
चाय
ठंडी
हो
गई
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Kazim Rizvi
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यही
सोच
कर
ख़ुद
पे
हम
नाज़
करते
कि
हम
उनकी
पहली
मुहब्बत
रहे
हैं
Harsh saxena
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तेरी
निगाह-ए-नाज़
से
छूटे
हुए
दरख़्त
मर
जाएँ
क्या
करें
बता
सूखे
हुए
दरख़्त
हैरत
है
पेड़
नीम
के
देने
लगे
हैं
आम
पगला
गए
हैं
आपके
चू
में
हुए
दरख़्त
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Varun Anand
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काबा
किस
मुँह
से
जाओगे
'ग़ालिब'
शर्म
तुम
को
मगर
नहीं
आती
Mirza Ghalib
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मुँह
फेर
कर
वो
कहते
हैं
बस
मान
जाइए
इस
शर्म
इस
लिहाज़
के
क़ुर्बान
जाइए
Bekhud Dehelvi
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नाज़
क्या
इस
पे
जो
बदला
है
ज़माने
ने
तुम्हें
मर्द
हैं
वो
जो
ज़माने
को
बदल
देते
हैं
Akbar Allahabadi
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हया
से
सर
झुका
लेना
अदास
मुस्कुरा
देना
हसीनों
को
भी
कितना
सहल
है
बिजली
गिरा
देना
Akbar Allahabadi
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मोहब्बत
के
इक़रार
से
शर्म
कब
तक
कभी
सामना
हो
तो
मजबूर
कर
दूँ
Akhtar Shirani
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हरीम-ए-नाज़
के
पर्दे
में
जो
निहाँ
था
कभी
उसी
ने
शोख़
अदाएँ
दिखा
के
लूट
लिया
Anwar Taban
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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उसका
चेहरा
याद
नहीं
कुछ
भी
अच्छा
याद
नहीं
बैठ
गया
हूँ
महफ़िल
में
अपना
लिक्खा
याद
नहीं
सोच
रहा
हूँ
घंटों
से
मुझ
को
क्या-क्या
याद
नहीं
फ़क़त
बिछड़ना
याद
रहा
अव्वल
मिलना
याद
नहीं
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jaani Aggarwal taak
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अजल
तक
बे-क़रारी
ही
रहेगी
हमारी
साँस
भारी
ही
रहेगी
मैं
तुमको
हार
कर
जीता
हूँ
लेकिन
ये
ग़लती
मुझपे
ही
भारी
रहेगी
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jaani Aggarwal taak
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अपना
कुछ
इस
तरह
गुज़ारा
हो
जो
भी
मेरा
हो
वो
तुम्हारा
हो
देखने
में
जो
सब
से
प्यारा
हो
ऐसे
लोगों
से
अब
किनारा
हो
एक
आवाज़
इतनी
प्यारी
थी
ख़ुद
ख़ुदा
ने
मुझे
पुकारा
हो
सोचने
पर
मुझे
किया
मजबूर
भाई
ने
भाई
को
ही
मारा
हो
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jaani Aggarwal taak
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पढ़ा
करता
था
मैं
भी
जौन
को
यूँँ
टूट
करके
कि
पागल
हिज्र
में
सारा
का
सारा
हो
गया
हूँ
jaani Aggarwal taak
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किसी
की
बाँह
था
में
वो
पड़ा
है
जिगर
छलनी
हमारा
हो
पड़ा
है
जिसे
मेरी
तबाही
चाहिए
थी
मिरे
कुछ
शे'र
पढ़
के
रो
पड़ा
है
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jaani Aggarwal taak
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