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Rohit Gustakh
bina baat ke ham lade ja rahe hain
bina baat ke ham lade ja rahe hain | बिना बात के हम लड़े जा रहे हैं
- Rohit Gustakh
बिना
बात
के
हम
लड़े
जा
रहे
हैं
कि
नज़दीक
आने
मरे
जा
रहे
हैं
- Rohit Gustakh
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हमारे
बा'द
चर्चा
कर
रहे
हैं
तिरी
यादों
को
रुस्वा
कर
रहे
हैं
ग़ज़ल
की
नाव
में
बैठे
हुए
हम
तिरे
ग़म
से
किनारा
कर
रहे
हैं
तबस्सुम
था
कभी
गहना
हमारा
उदासी
से
गुज़ारा
कर
रहे
हैं
तिरी
ये
बे-हयाई
और
तग़ाफ़ुल
रक़ीबों
को
इशारा
कर
रहे
हैं
बुरा
है
वक़्त
सो
हम
ज़िंदगी
में
किसी
पर
भी
भरोसा
कर
रहे
हैं
शिकायत
क्या
करें
हम
दुश्मनों
से
हबीबों
से
किनारा
कर
रहे
हैं
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Rohit Gustakh
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मिरे
घर
क्यूँँ
ले
आते
हो
गली
बाज़ार
की
बातें
चिढ़ाती
हैं
मुझे
झूठे
बिके
अख़बार
की
बातें
मुकरता
है
हमेशा
तू
किए
वादे
निभाने
से
तेरे
वादे
तिरी
क़स
में
हुईं
सरकार
की
बातें
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Rohit Gustakh
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आबरू
को
मेरी
जब
उछाला
गया
होश
मुझ
सेे
न
मेरा
सँभाला
गया
पहले
हम
सेे
निकाले
गए
काम
सब
फिर
दिलों
से
हमें
भी
निकाला
गया
जुगनुओं
से
भला
क्यूँँ
शिकायत
करें
हाथ
से
चाँद
का
जब
उजाला
गया
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Rohit Gustakh
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रक़ीबों
ने
कहा
मुझ
सेे
दिखाओ
रूम
तुम
अपना
किताबें
ग़म
उदासी
और
इक
फ़ोटो
मिली
उनको
Rohit Gustakh
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किनारा
कर
लिया
अच्छा
किया
प्यारे
मुहब्बत
नाम
है
उसका
डुबा
देती
Rohit Gustakh
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