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Rohit Gustakh
mohabbat ko paraai kar rahi ho
mohabbat ko paraai kar rahi ho | मोहब्बत को पराई कर रही हो
- Rohit Gustakh
मोहब्बत
को
पराई
कर
रही
हो
सुना
है
तुम
सगाई
कर
रही
हो
यहाँ
बस
ज़िंदगी
इक
तीरगी
है
वहाँ
तुम
मुँह-दिखाई
कर
रही
हो
क़फ़स
मायूस
हो
कर
रो
रहा
है
परिंदे
की
रिहाई
कर
रही
हो
ग़म-ए-दुनिया
से
आगे
कुछ
नहीं
है
जहाँ
तुम
आशनाई
कर
रही
हो
- Rohit Gustakh
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कौन
डुबाएगा
दरिया
में
हमको
ख़ुद
पर
राम
लिखेंगे
तर
जाएँगे
Rohit Gustakh
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दबाती
है
गला
मेरा
ख़मोशी
उदासी
झाँकती
है
खिड़कियों
से
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दिल
के
घाव
कभी
तो
भर
जाएँगे
पर
नज़रों
से
लोग
उतर
जाएँगे
हम
सच
की
कुटिया
के
बाशिंदे
हैं
झूठ
अगर
बोले
तो
मर
जाएँगे
राजा
दशरथ
को
ये
इल्म
कहाँ
था
ख़ुद
के
वरदानों
से
मर
जाएँगे
कौन
डुबाएगा
दरिया
में
हमको
ख़ुद
पर
राम
लिखेंगे
तर
जाएँगे
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Rohit Gustakh
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उसी
का
मुन्तज़िर
भी
है
हमारा
दिल
उसी
को
भूलना
भी
चाहते
है
हम
Rohit Gustakh
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तुम्हें
कैसे
बताएँ
हम
कि
कैसे
हैं
बिना
उसके
उसे
बस
ये
बताना
तुम
कि
अच्छे
हैं
बिना
उसके
वो
पूछे
तो
बता
देना
हमारा
हाल
ये
उसको
मुकम्मल
ख़्वाब
आँखों
में
अधूरे
हैं
बिना
उसके
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Rohit Gustakh
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