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Gulfam Ajmeri
aisa na ho mujh par taras kha jaa.e tu
aisa na ho mujh par taras kha jaa.e tu | ऐसा न हो मुझ पर तरस खा जाए तू
- Gulfam Ajmeri
ऐसा
न
हो
मुझ
पर
तरस
खा
जाए
तू
आँखों
का
क्या
आँखें
तो
बहती
रहती
है
- Gulfam Ajmeri
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आँख
खुली
तो
सपना
भूल
गए
प्यास
बुझी
तो
दरिया
भूल
गए
सारा
कमरा
बिखेर
डाला
है
रख
कर
कहीं
पे
दुनिया
भूल
गए
कल
शब
हम
को
जो
याद
आया
था
हम
तो
उसको
कब
का
भूल
गए
हमको
रक़्स
सिखाने
आते
हैं
जो
ख़ुद
सीधा
चलना
भूल
गए
हम
से
न
पूछ
कुछ
भी
नामाबर
हम
ख़ुद
घर
का
रस्ता
भूल
गए
बातों
में
उलझाया
साक़ी
ने
कल
शब
हम
तो
पीना
भूल
गए
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इश्क़
पहले
पहले
तो
अच्छा
लगेगा
अजनबी
भी
तुझ
को
फिर
तेरा
लगेगा
जिस
अदास
हम
ने
तुम
से
ज़ख़्म
खाए
कैसे
मरहम
कैसे
अब
टाँका
लगेगा
हम
को
जाना
है
इसी
दरिया
के
उस
पार
सुनने
में
आया
यहाँ
पहरा
लगेगा
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Gulfam Ajmeri
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मुझ
से
पहली
मर्तबा
तू
जब
मिला
था
बज़्म
में
उस
वक़्त
तू
सब
से
जुदा
था
हिज्र
में
रोया
नहीं
फिर
मेरा
दिल
भी
इस
को
तो
तेरे
बिछड़ने
का
पता
था
क़ैस
भी
मारा
गया
राँझा
भी
वरना
चाहे
जो
कर
सकता
था
तू
तो
ख़ुदा
था
ख़ुद-कुशी
करता
नहीं
मैं
पर
मिरे
साथ
ज़िंदगी
तुझ
को
पता
है
क्या
हुआ
था
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Gulfam Ajmeri
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तेरे
बाद
क्या
ये
ख़ाक
ज़िन्दगी
रही
और
मिरा
पता
उदासी
पूछती
रही
मेरे
यार
मुझ
को
हिज्र
खा
गया
तिरा
और
मेरी
माँ
नज़र
उतारती
रही
तुम
तो
उठ
के
चल
दिए
मिरे
क़रीब
से
मेरी
ख़ामुशी
तुम्हें
पुकारती
रही
मेरे
सारे
ख़्वाब
जल
के
राख
हो
गए
और
इधर
हवा
चराग़
ढूँढती
रही
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तुझ
से
मिलें
बातें
करें
सो
आ
बैठे
हम
और
इरादे
से
नहीं
आए
हैं
Gulfam Ajmeri
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