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Gulfam Ajmeri
zehni beemaar ki.e deta hai
zehni beemaar ki.e deta hai | ज़ेहनी बीमार किए देता है
- Gulfam Ajmeri
ज़ेहनी
बीमार
किए
देता
है
दिल
को
बाज़ार
किए
देता
है
सोचता
हूँ
मैं
कि
अब
मर
जाऊँ
दार
दस्तार
किए
देता
है
रो
भी
सकता
हूँ
दिखाऊँ
हँस
कर
हाल
अदाकार
किए
देता
है
उसको
अब
कुछ
भी
नहीं
देना
तुम
चीज़
बेकार
किए
देता
है
फिर
मिरी
नींद
को
किसने
तोड़ा
ख़्वाब
मिस्मार
किए
देता
है
जुस्तजू
क़त्ल
नहीं
हो
सकती
पर
मिरा
यार
किए
देता
है
- Gulfam Ajmeri
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अजब
अंदाज़
से
ये
घर
गिरा
है
मिरा
मलबा
मिरे
ऊपर
गिरा
है
Gulfam Ajmeri
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मुझे
पहली
सफ़
में
खड़ा
करते
थे
अजब
लोग
दिल
में
रहा
करते
थे
उसे
हम
जकड़
लेते
थे
बाहों
में
बड़ी
देर
से
फिर
रिहा
करते
थे
वो
भी
लोग
तन्हा
हमें
कर
गए
वो
जो
जौन
तक
को
पढ़ा
करते
थे
वो
लड़की
मुझे
जब
छुआ
करती
थी
अलग
ही
नशे
में
हुआ
करते
थे
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गिला
कुछ
भी
नहीं
है
मौत
से
मुझको
पर
ख़ुदा
लेने
अगर
आया
तो
जाऊँगा
मैं
Gulfam Ajmeri
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यूँँ
तो
तिरे
इस
शहर
में
बीमार
बहुत
है
मरने
के
लिए
तो
तेरा
इनकार
बहुत
है
जो
शहर
बसाने
को
मुहब्बत
लगी
होगी
वो
शहर
जलाने
को
तो
अख़बार
बहुत
है
बोसे
वो
तो
देती
रही
कुछ
हम
भी
न
बोले
हमको
तो
मिरी
जान
ये
दरकार
बहुत
है
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आँधी
चलती
है
रात-भर
मुझ
में
टूट
कर
गिर
गए
शजर
मुझ
में
ज़ख़्म
ले
के
मैं
अब
कहाँ
जाऊँ
शे'र
कहता
है
चारा-गर
मुझ
में
कौन
था
जिस
से
ये
मुहब्बत
थी
कौन
फिर
कर
गया
असर
मुझ
में
रहगुज़र
किस
तरफ़
मुझे
लाया
रो
पड़ा
मेरा
हम-सफ़र
मुझ
में
आतिश-ए-दिल
है
दरमियाँ
ऐसी
जल
रहा
हो
किसी
का
घर
मुझ
में
क़ैद-ख़ाने
में
ख़ुश
थे
जो
पंछी
उड़ते
हैं
अब
इधर
उधर
मुझ
में
कोहकन
तोड़ता
है
जाने
क्या
क्या
बनाता
है
कूज़ा-गर
मुझ
में
तू
ही
इक
दिन
उजाड़
दे
मुझ
को
एक
दिन
तू
ही
बन-सँवर
मुझ
में
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Gulfam Ajmeri
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