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Govind kumar
door hamse kahii aur jaate hue
door hamse kahii aur jaate hue | दूर हम सेे कही और जाते हुए
- Govind kumar
दूर
हम
सेे
कही
और
जाते
हुए
वो
लगा
हँसने
चेहरा
छुपाते
हुए
तितलियां
कह
रही
हैं
हवाओं
से
ये
ख़ुश्बू
लाना
किसी
गुल
से
आते
हुए
हमने
भी
कर
लिए
सब
से
रिश्ते
बुरे
एक
लड़की
को
अपना
बनाते
हुए
हमको
उन
सेे
मुहब्बत
हुई
क्या
करें
जो
तरस
भी
न
खाएं
सताते
हुए
वो
मिरी
हाथ
की
उन
लकीरों
में
था
मिट
गई
है
जो
घर
को
बनाते
हुए
मैं
उसे
कैसे
समझाऊँ
ये
बात
अब
आँख
थक
जाती
है
ग़म
छुपाते
हुए
उसको
लगता
तो
है
चाँद
प्यारा
बहुत
हाँ
मगर
अपने
कद
को
घटाते
हुए
एक
ही
ज़िन्दगी
तो
मिली
है
हमें
बीत
जानी
है
ये
भी
मनाते
हुए
- Govind kumar
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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मैं
सोचता
हूँ
जब
कभी
आओगी
सामने
किस
मुँह
से
कह
सकूँगा
मोहब्बत
नहीं
रही
Shoonya
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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मुझे
एक
लाश
कहकर
न
बहाओ
पानियों
में
मेरा
हाथ
छू
के
देखो
मेरी
नब्ज़
चल
रही
है
Azm Shakri
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मुसाफ़िरों
के
दिमाग़ों
में
डर
ज़ियादा
है
न
जाने
वक़्त
है
कम
या
सफ़र
ज़ियादा
है
Hashim Raza Jalalpuri
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उन्हीं
रास्तों
ने
जिन
पर
कभी
तुम
थे
साथ
मेरे
मुझे
रोक
रोक
पूछा
तिरा
हम-सफ़र
कहाँ
है
Bashir Badr
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आँख
से
निकला
फ़साना
बन
गया
इस-क़दर
आँसू
निशाना
बन
गया
Govind kumar
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साल
भर
पढ़ते
रहे
बस
पाई,
थीटा
दुख
गरीबी
का
मिटाने
के
लिए
हम
Govind kumar
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हर-घड़ी
बेकार
जाती
है
ज़िन्दगी
जब
हार
जाती
है
मौत
ही
है
वो
हक़ीक़त,
जो
हर
ज़रूरत
मार
जाती
है
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Govind kumar
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तुम
बिछड़कर
मुस्कराना
चाहती
हो
यानी
मुफ़लिस
से
ख़ज़ाना
चाहती
हो
Govind kumar
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ले
न
जाए
मिरी
जाँ,
यार
उदासी
चाहता
कौन
है
हर
बार
उदासी
दिल
किसी
से
न
लगा
बाद
तिरे
अब
खा
गई
हमको,ये
बेकार
उदासी
ख़्वाब
में
भी
न
गया
दूर
तू
हम
सेे
अब
नहीं
और
है
दरकार
उदासी
इसलिए
फूल
भी
अब
हो
गए
हैं
ज़र्द
पेड़
को
कर
गई
बीमार
उदासी
मैं
उसे
कैसे
कहूँ
प्यार
है
तुम
सेे
करने
देती
नहीं
इज़हार
उदासी
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Govind kumar
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