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Gaurav Singh
aap silvat chahte hain bistre men aur ham hain
aap silvat chahte hain bistre men aur ham hain | आप सिलवट चाहते हैं बिस्तरे में और हम हैं
- Gaurav Singh
आप
सिलवट
चाहते
हैं
बिस्तरे
में
और
हम
हैं
बिस्तरे
की
आबरू
पर
शे'र
कहना
चाहते
हैं
- Gaurav Singh
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ज़ख़्म
की
इज़्ज़त
करते
हैं
देर
से
पट्टी
खोलेंगे
चेहरा
पढ़ने
वाले
चोर
गठरी
थोड़ी
खोलेंगे
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Khurram Afaq
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कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
Nadeem Shaad
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हर
किसी
से
ही
मुहब्बत
माँगता
है
दिल
तो
अब
सब
सेे
अक़ीदत
माँगता
है
सीख
आया
है
सलीक़ा
ग़ुफ़्तगू
का
मुझ
सेे
मेरा
दोस्त
इज़्ज़त
माँगता
है
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चादर
की
इज़्ज़त
करता
हूँ
और
पर्दे
को
मानता
हूँ
हर
पर्दा
पर्दा
नइँ
होता
इतना
मैं
भी
जानता
हूँ
Ali Zaryoun
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लड़
सको
दुनिया
से
जज़्बों
में
वो
शिद्दत
चाहिए
इश्क़
करने
के
लिए
इतनी
तो
हिम्मत
चाहिए
कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
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Nadeem Shaad
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ऐ
"दाग़"
बुरा
मान
ना
तू
उसके
कहे
का
माशूक
की
गाली
से
तो
इज़्ज़त
नहीं
जाती
Dagh Dehlvi
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तुम्हें
लगा
है
कि
मेरे
होते,
तुम्हें
भी
दिल
में
जगह
मिलेगी
बड़ी
ही
इज़्ज़त
से
कह
रहा
हूँ
,चलो
उठो
अब
मेरी
जगह
से
Shadab Asghar
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अल्लाह
तेरे
हाथ
है
अब
आबरू-ए-शौक़
दम
घुट
रहा
है
वक़्त
की
रफ़्तार
देख
कर
Bismil Azimabadi
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सुन
ओ
कहानीकार
कोई
ऐसा
रोल
दे
ऐसे
अदा
करूँं
मेरी
इज़्ज़त
बनी
रहे
Afzal Ali Afzal
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ज़िंदा
रहने
की
ये
तरक़ीब
निकाली
हमने
बात
बिगड़ी
हुई
कुछ
ऐसे
सँभाली
हमने
उस
सेे
समझौता
किया
है
उसी
की
शर्तों
पे
जान
भी
बच
गई
इज़्ज़त
भी
बचा
ली
हमने
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Divyansh Shukla
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क्या
विवशता
थी
वो
सोचो
क्या
समय
आया
था
वो
भी
राम
जी
सीता
से
बोले
आग
पर
चलना
पड़ेगा
Gaurav Singh
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दिन
में
जितनी
बार
धड़कता
है
ये
दिल
उतने
बोसे
तुझ
पर
मेरे
बनते
हैं
Gaurav Singh
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इजाज़त
हो
सुनाऊँ
यार
ग़ज़लें
बदन
के
ज़ाविये
पर
चार
ग़ज़लें
कई
सौ
शे'र
तन्हा
हो
गए
और
ग़ज़ल
के
नाम
पे
बस
चार
ग़ज़लें
हमारा
काम
अच्छा
चल
रहा
था
हमें
भी
हो
गई
दुश्वार
ग़ज़लें
हमारी
ज़िंदगी
में
यूँँ
समझिए
निभाती
हैं
कई
क़िरदार
ग़ज़लें
लगाते
हैं
अभी
जो
प्यार
की
रट
कहेंगे
एक
दिन
दीं-दार
ग़ज़लें
हुए
हैं
जिसके
चक्कर
में
ग़ज़लगो
उसी
को
लग
रही
बेकार
ग़ज़लें
ग़ज़ल
के
रोग
से
बचकर
के
रहिए
करे
हैं
ठीक
को
बीमार
ग़ज़लें
किसी
के
वास्ते
दरिया
सी
गहरी
किसी
के
वास्ते
पतवार
ग़जलें
हमारी
बात
चाहो
लिख
के
ले
लो
करेंगी
एक
दिन
यलग़ार
ग़ज़लें
अगर
बरसा
सके
हैं
फूल
ग़ज़लें
उठा
सकती
हैं
फिर
तलवार
ग़ज़लें
समझ
आने
लगी
है
धीरे
धीरे
हमें
भी
मीर
की
तहदार
ग़ज़लें
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Gaurav Singh
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मिला
के
लब
से
लब
को
हम
हमारी
कई
सदियों
की
दूरी
तय
करेंगे
Gaurav Singh
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मेरे
मालिक
ये
क्या
किया
तुमने
सर
से
साया
हटा
दिया
तुमने
याद
आने
लगा
है
क्यूँ
कोई
क्या
पिलाया
है
साक़िया
तुमने
वो
भी
रावण
निकल
गए
जिनको
यार
समझा
था
औलिया
तुमने
एक
मुझ
सेे
ही
हो
ख़फ़ा
वरना
कैसे
कैसों
को
दिल
दिया
तुमने
हो
गई
शा'इरी
ग़ज़ब
तुम
सेे
ले
लिया
दुख
का
क़ाफ़िया
तुमने
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Gaurav Singh
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