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Dinesh Sen Shubh
bahaana hai ki roka tha humeen ne
bahaana hai ki roka tha humeen ne | बहाना है कि रोका था हमीं ने
- Dinesh Sen Shubh
बहाना
है
कि
रोका
था
हमीं
ने
कहो
ना
आपका
भी
मन
नहीं
था
- Dinesh Sen Shubh
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राधिका
से
भी
कृष्ण
बिछड़े
थे
तुम
को
लगता
है
तुम
अकेले
हो
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किसी
को
हो
गया
सोना
मुनासिब
किसी
को
जागकर
रोना
मुनासिब
है
मानो
ज़िंदगी
की
कश्मकश
में
जो
पहना
है
वही
धोना
मुनासिब
जहाँ
से
जीत
की
ख़ातिर
चले
थे
वहीं
पर
हार
कर
होना
मुनासिब
दिया
इस
साल
मेरे
रब
ने
इतना
जो
काटा
था
वही
बोना
मुनासिब
करो
ईज़ाद
अब
मिट्टी
के
ज़ेवर
सभी
को
है
कहाँ
सोना
मुनासिब
मैं
ख़ुश
रहता
हूँ
बस
ये
सोच
कर
के
वही
होगा
जो
है
होना
मुनासिब
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Dinesh Sen Shubh
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खींच
कर
हाथ
छुड़ाया
तुमने
इस
तरह
साथ
निभाया
तुमने
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तमाम
रात
निकलनी
है
याद
करने
में
तमाम
दिन
हुई
थीं
कोशिशें
भुलाने
की
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ग़म
दिसंबर
की
सर्द
रातों
का
दे
रहा
ख़ूब
दर्द
रातों
का
औरतें
रोईं
तो
दिखीं
सब
को
न
दिखा
रोता
मर्द
रातों
का
जो
रहा
कल
तलक
फटा
पन्ना
हो
गया
आज
फ़र्द
रातों
का
आज
का
चाँद
हो
गया
है
वो
रंग
जिसका
था
ज़र्द
रातों
का
वो
जो
करता
ग़ुरूर
शुभ
दिन
का
वो
ही
होता
है
गर्द
रातों
का
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Dinesh Sen Shubh
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