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Dinesh Sen Shubh
gham december kii sard raaton ka
gham december kii sard raaton ka | ग़म दिसंबर की सर्द रातों का
- Dinesh Sen Shubh
ग़म
दिसंबर
की
सर्द
रातों
का
दे
रहा
ख़ूब
दर्द
रातों
का
औरतें
रोईं
तो
दिखीं
सब
को
न
दिखा
रोता
मर्द
रातों
का
जो
रहा
कल
तलक
फटा
पन्ना
हो
गया
आज
फ़र्द
रातों
का
आज
का
चाँद
हो
गया
है
वो
रंग
जिसका
था
ज़र्द
रातों
का
वो
जो
करता
ग़ुरूर
शुभ
दिन
का
वो
ही
होता
है
गर्द
रातों
का
- Dinesh Sen Shubh
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ख़ूब-सूरत
किताब
लगता
है
शख़्स
वो
ला-जवाब
लगता
है
उसकी
गर्दन
के
तिल
कँवल
जैसे
उसका
चेहरा
गुलाब
लगता
है
साथ
में
उसके
सौ
सिपाही
हैं
उसका
यौवन
नवाब
लगता
है
पास
उसके
रहूँ
तो
सब
अच्छा
उसके
बिन
सब
ख़राब
लगता
है
उसकी
लहरें
उफ़ान
लेती
हैं
वो
कोई
खारा
आब
लगता
है
जब
कोई
हाँ
में
हाँ
मिलाता
है
सुन
के
अच्छा
जवाब
लगता
है
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कोई
लड़की
मुकर
जाए
जो
अपने
वादे
से
हुई
होगी
कोई
ग़लती
कहीं
तो
तुम
सेे
भी
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हो
गहरी
बात
तो
गहराई
से
समझा
करो
यारो
कोई
शा'इर
कभी
अश'आर
बेमतलब
नहीं
लिखता
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तमाम
रात
निकलनी
है
याद
करने
में
तमाम
दिन
हुई
थीं
कोशिशें
भुलाने
की
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तसव्वुर
में
बिठा
कर
ले
गए
हो
उसे
अपना
बना
कर
ले
गए
हो
मुझे
आज़ाद
तो
जाना
था
करके
अगर
पिंज़रा
उठा
कर
ले
गए
हो
बड़ी
मुश्किल
में
हूँ
रहना
कहाँ
है
मिरा
घर
ही
सजा
कर
ले
गए
हो
बताओ
धड़
भला
किस
काम
का
है
वो
सर
जिसका
जुदा
कर
ले
गए
हो
शहर
में
और
भी
धन
के
घड़े
थे
मिरा
दिलबर
चुरा
कर
ले
गए
हो
किसी
की
रात
काली
कर
गए
हो
किसी
दिन
का
दिवाकर
ले
गए
हो
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